भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182

अथास्य सहसाविध्यद्धयांन् दशभिराशुगैः । दशभिर्दशभिः क्रुद्ध उभौ च पार्ष्णिसारथी ॥ ७ ॥ इसके बाद सत्यजित्‌ने सहसा दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उनके घोड़ोंको बींध डाला और कुपित होकर दोनों पृष्ठरक्षकोंको भी दस-दस बाण मारे ॥ ७ ॥

मण्डलं तु समावृत्य विचरन् पृतनामुखे । ध्वजं चिच्छेद च क्रुद्धो द्रोणस्यामित्रकर्षणः ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् शत्रुसूदन सत्यजित्‌ने अत्यन्त कुपित हो सेनाके प्रमुख भागमें मण्डलाकार विचरते हुए अपने बाणद्वारा द्रोणाचार्यके ध्वजको भी काट डाला ॥ ८ ॥

द्रोणस्तु तत् समालोक्य चरितं तस्य संयुगे । मनसा चिन्तयामास प्राप्तकालमरिंदमः ॥ ९ ॥ तब शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें उसका वह पराक्रम देख मन-ही-मन समयोचित कर्तव्यका चिन्तन किया ॥ ९ ॥

ततः सत्यजितं तीक्ष्णैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः । अविध्यच्छीघ्रमाचार्यश्छित्त्वास्य सशरं धनुः ॥ १० ॥ तदनन्तर आचार्यने सत्यजित्‌के बाणसहित धनुषको काटकर मर्मस्थलको विदीर्ण करनेवाले दस पैने बाणोंद्वारा उसे शीघ्र ही घायल कर दिया ॥ १० ॥

स शीघ्रतरमादाय धनुरन्यत् प्रतापवान् । द्रोणमभ्यहनद् राजंस्त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः ॥ ११ ॥ राजन्! धनुष कट जानेपर प्रतापी वीर सत्यजित्‌ने शीघ्र ही दूसरा धनुष लेकर कंककी पाँखसे युक्त तीस बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ११ ॥

दृष्ट्वा सत्यजिता द्रोणं ग्रस्यमानमिवाहवे । वृकः शरशतैस्तीक्ष्णैः पाञ्चाल्यो द्रोणमार्दयत् ॥ १२ ॥ उस युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यको सत्यजित्‌के बाणोंका ग्रास बनते देख पांचालवीर वृकने भी सैकड़ों पैने बाण मारकर द्रोणाचार्यको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ॥ १२ ॥

संछाद्यमानं समरे द्रोणं दृष्ट्वा महारथम् । चुक्रुशुः पाण्डवा राजन् वस्त्राणि दुधुवुश्च ह ॥ १३ ॥ राजन्! महारथी द्रोणाचार्यको समरभूमिमें बाणोंद्वारा आच्छादित होते देख समस्त पाण्डव-सैनिक गर्जने और वस्त्र हिलाने लगे ॥ १३ ॥

वृकस्तु परमक्रुद्धो द्रोणं षष्ट्या स्तनान्तरे । विव्याध बलवान् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! बलवान् वृकने अत्यन्त कुपित होकर द्रोणाचार्यकी छातीमें साठ बाण मारे। वह अद्भुत-सी बात थी ॥ १४ ॥

द्रोणस्तु शरवर्षेण च्छाद्यमानो महारथः ।