महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्हींकी ओर बढ़े जा रहे थे ॥ ४२ ॥
विषाणाभिहताश्चापि केचित् तत्र गजा गजैः । चक्रुरार्तस्वनं घोरमुत्पातजलदा इव ॥ ४३ ॥
कुछ हाथी वहाँ हाथियोंद्वारा दाँतोंसे घायल किये जानेपर उत्पातकालके मेघोंके समान भयंकर आर्तनाद कर रहे थे ॥ ४३ ॥
प्रतीपाः क्रियमाणाश्च वारणा वरवारणैः । उन्मथ्य पुनराजग्मुः प्रेरिताः परमाङ्कुशैः ॥ ४४ ॥
कितने ही हाथी शत्रुपक्षके श्रेष्ठ हाथियोंद्वारा घायल हो युद्धभूमिसे विमुख कर दिये गये थे। वे पुनः महावतोंद्वारा उत्तम अंकुशोंसे हाँके जानेपर अपनी ही सेनाको रौंदते हुए पुनः लौट आये ॥ ४४ ॥
महामात्रैर्महामात्रास्ताडिताः शरतोमरैः । गजेभ्यः पृथिवीं जग्मुर्मुक्तप्रहरणाङ्कुशाः ॥ ४५ ॥
महावतोंने बाणों और तोमरोंसे महावतोंको भी घायल कर दिया था। अतः वे हाथियोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े और उनके आयुध एवं अंकुश हाथोंसे छूटकर इधर-उधर जा गिरे ॥ ४५ ॥
निर्मनुष्याश्च मातङ्गा विनदन्तस्ततस्ततः । छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुः सम्प्रविश्य परस्परम् ॥ ४६ ॥
कितने ही गजराज मनुष्योंसे शून्य हो इधर-उधर चीत्कार करते हुए फिर रहे थे। वे एक-दूसरेकी सेनामें घुसकर फटे हुए बादलोंके समान छिन्न-भिन्न हो धरतीपर गिर पड़े ॥ ४६ ॥
हतान् परिवहन्तश्च पतितान् पतितायुधान् । दिशो जग्मुर्महानागाः केचिदेकचरा इव ॥ ४७ ॥
कितने ही बड़े-बड़े हाथी अपनी पीठपर मरकर गिरे हुए आयुधशून्य सवारोंको ढोते हुए अकेले विचरनेवाले गजराजोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें चक्कर लगा रहे थे ॥ ४७ ॥
ताडितास्ताड्यमानाश्च तोमरर्ष्टिपरश्वधैः । पेतुरार्तस्वनं कृत्वा तदा विशसने गजाः ॥ ४८ ॥
उस समय बहुत-से हाथी उस युद्धस्थलमें तोमर, ऋष्टि तथा फरसोंकी मार खाकर घायल हो आर्तनाद करके धरतीपर गिर जाते थे ॥ ४८ ॥
तेषां शैलोपमैः कायैर्निपतद्भिः समन्ततः । आहता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च ॥ ४९ ॥
उनके पर्वताकार शरीरोंके गिरनेसे सब ओरसे आहत हुई भूमि सहसा काँपने और आर्तनाद करने लगी ॥ ४९ ॥
सादितैः सगजारोहैः सपताकैः समन्ततः ।