महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमातङ्गैः शुशुभे भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतैः ॥ ५० ॥ वहाँ मारे जाकर पताकाओं तथा गजारोहियोंसहित सब ओर गिरे हुए हाथियोंसे आच्छादित हुई वह भूमि ऐसी शोभा पा रही थी, मानो इधर-उधर बिखरे हुए पर्वतखण्डोंसे व्याप्त हो रही हो ॥ ५० ॥
गजस्थाश्च महामात्रा निर्भिन्नहृदया रणे ।
रथिभिः पातिता भल्लैर्विकीर्णाङ्कुशतोमराः ॥ ५१ ॥
उस रणक्षेत्रमें कितने ही रथियोंने अपने भल्लोंद्वारा हाथीपर बैठे हुए महावतोंकी छाती छेदकर उन्हें सहसा मार गिराया। उन महावतोंके अंकुश और तोमर इधर-उधर बिखर गये थे ॥ ५१ ॥
क्रौञ्चवद् विनदन्तोऽन्ये नाराचाभिहता गजाः ।
परान् स्वांश्चापि मृद्नन्तः परिपेतुर्दिशो दश ॥ ५२ ॥
कितने हीं हाथी नाराचोंसे घायल हो क्रौंच पक्षीकी भाँति चिग्घाड़ रहे थे और अपने तथा शत्रुपक्षके सैनिकोंको भी रौंदते हुए दसों दिशाओंमें भाग रहे थे ॥ ५२ ॥
गजाश्वरथयोधानां शरीरौघसमावृता ।
बभूव पृथिवी राजन् मांसशोणितकर्दमा ॥ ५३ ॥
राजन्! हाथी, घोड़े तथा रथ-योद्धाओंकी लाशोंसे ढकी हुई वहाँकी भूमिपर रक्त और मांसकी कीच जम गयी थी ॥ ५३ ॥
प्रमथ्य च विषाणाग्रैः समुत्क्षिप्ताश्च वारणैः ।
सचक्राश्च विचक्राश्च रथैरेव महारथाः ॥ ५४ ॥
कितने ही हाथियोंने अपने दाँतोंके अग्रभागसे पहियेवाले तथा बिना पहियेके बड़े-बड़े रथोंको रथियोंसहित चकनाचूर करके अपनी सूँड़ोंसे उछालकर फेंक दिया ॥ ५४ ॥
रथाश्च रथिभिर्हीना निर्मनुष्याश्च वाजिनः ।
हतारोहाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुर्भयातुराः ॥ ५५ ॥
रथियोंसे रहित रथ, सवारोंसे शून्य घोड़े और जिनके सवार मार डाले गये हैं ऐसे हाथी भयसे व्याकुल हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग रहे थे ॥ ५५ ॥
जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ।
इत्यासीत् तुमुलं युद्धं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५६ ॥
वहाँ पिताने पुत्रको और पुत्रने पिताको मार डाला। ऐसा भयंकर युद्ध हो रहा था कि किसीको कुछ भी ज्ञात नहीं होता था ॥ ५६ ॥
आगुल्फेभ्योऽवसीदन्ते नरा लोहितकर्दमैः ।
दीप्यमानैः परिक्षिप्ता दावैरिव महाद्रुमाः ॥ ५७ ॥
मनुष्योंके पैर रक्तकी कीचमें टखनोंतक धँस जाते थे। उस समय वे दहकते हुए दावानलसे घिरे हुए बड़े-बड़े वृक्षोंके समान जान पड़ते थे ॥ ५७ ॥