महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशोणितैः सिच्यमानानि वस्त्राणि कवचानि च ।
छत्राणि च पताकाश्च सर्वं रक्तमदृश्यत ॥ ५८ ॥
योद्धाओंके वस्त्र, कवच, ध्वज और पताकाएँ रक्तसे सींच उठी थीं। वहाँ सब कुछ रक्तसे रँगकर लाल-ही-लाल दिखायी देता था ॥ ५८ ॥
हयौघाश्च रथौघाश्च नरीघाश्च निपातिताः ।
संक्षुण्णाः पुनरावृत्य बहुधा रथनेमिभिः ॥ ५९ ॥
रणभूमिमें गिराये हुए घोड़ों, रथों और पैदलोंके समुदाय बारंबार आते-जाते रथोंके पहियोंसे कुचलकर टुकड़े-टुकड़े हो जाते थे ॥ ५९ ॥
सगजौघमहावेगः परासुनरशैवलः ।
रथौघतुमुलावर्तः प्रबभौ सैन्यसागरः ॥ ६० ॥
वह सेनाका समुद्र हाथियोंके समूहरूपी महान् वेग, मरे हुए मनुष्यरूपी सेवार तथा रथसमूहरूपी भयंकर भँवरोंके कारण अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ ६० ॥
तं वाहनमहानौभिर्योधा जयधनैषिणः ।
अवगाह्याथ मज्जन्तो नैव मोहं प्रचक्रिरे ॥ ६१ ॥
विजयरूपी धनकी इच्छा रखनेवाले योद्धारूपी व्यापारी वाहनरूपी बड़ी-बड़ी नौकाओंद्वारा उस सैन्य-समुद्रमें उतरकर डूबते हुए भी प्राणोंका मोह नहीं करते थे ॥ ६१ ॥
शरवर्षाभिवृष्टेषु योधेष्वञ्चितलक्ष्मसु ।
न तेष्वचित्तां लेभे कश्चिदाहतलक्षणः ॥ ६२ ॥
वहाँ समस्त योद्धाओंपर बाणोंकी वर्षा हो रही थी। कहीं उनके चिह्न लुप्त नहीं थे। उनमेंसे कोई भी योद्धा अपनी ध्वज आदि चिह्नोंके नष्ट हो जानेपर भी मोहको नहीं प्राप्त हुआ ॥ ६२ ॥
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भयंकरे ।
मोहयित्वा परान् द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ६३ ॥
इस प्रकार जब अत्यन्त भयंकर घोर युद्ध चल रहा था, उस समय शत्रुओंको मोहित करके द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि संकुलयुद्धे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार महाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं।)