महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः
द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार
संजय उवाच
परिणाम्य निशां तां तु भारद्वाजो महारथः ।
उक्त्वा सुबहु राजेन्द्र वचनं वै सुयोधनम् ॥ १ ॥
विधाय योगं पार्थेन संशप्तकगणैः सह ।
निष्क्रान्ते च तदा पार्थे संशप्तकवधं प्रति ॥ २ ॥
व्यूढानीकस्ततो द्रोणः पाण्डवानां महाचमूं ।
अभ्ययाद् भरतश्रेष्ठ धर्मराजजिघृक्षया ॥ ३ ॥
**संजय कहते हैं—**राजेन्द्र! महारथी द्रोणाचार्यने वह रात बिताकर दुर्योधनसे बहुत कुछ बातें कहीं और संशप्तकोंके साथ अर्जुनके युद्धका योग लगा दिया। भरतश्रेष्ठ! फिर संशप्तकोंका वध करनेके लिये अर्जुन जब दूर निकल गये, तब सेनाकी व्यूहरचना करके धर्मराज युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये द्रोणाचार्यने पाण्डवोंकी विशाल सेनापर आक्रमण किया ॥ १–३ ॥
व्यूढं दृष्ट्वा सुपर्णं तु भारद्वाजकृतं तदा ।
व्यूहेन मण्डलार्धेन प्रत्यव्यूहद् युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥
द्रोणाचार्यके बनाये हुए गरुड़व्यूहको देखकर युधिष्ठिरने अपनी सेनाका मण्डलार्धव्यूह बनाया ॥ ४ ॥
मुखं त्वासीत् सुपर्णस्य भारद्वाजो महारथः ।
शिरो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैर्वृतः ।
चक्षुषी कृतवर्माऽऽसीद् गौतमश्चास्यतां वरः ॥ ५ ॥
गरुड़व्यूहमें गरुड़के मुँहके स्थानपर महारथी द्रोणाचार्य खड़े थे। शिरोभागमें भाइयों तथा अनुगामी सैनिकोंसहित राजा दुर्योधन उपस्थित हुआ। बाण चलानेवालोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्य और कृतवर्मा उस व्यूहकी आँखके स्थानमें स्थित हुए ॥ ५ ॥
भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाशश्च वीर्यवान् ।
कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः ॥ ६ ॥
शका यवनकाम्बोजास्तथा हंसपथाश्च ये ।
ग्रीवायां शूरसेनाश्च दरदा मद्रकेकयाः ॥ ७ ॥