महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाँपने लगे ॥ ३० ॥ उत्तमं ह्याददानस्य धनुरस्याशुकारिणः । ज्याघोषो निघ्नतोऽमित्रान् दिक्षु सर्वासु शुश्रुवे ॥ ३१ ॥ उत्तम धनुष लेकर शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाने और शत्रुओंका वध करनेवाले द्रोणाचार्यकी प्रत्यंचाका शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी पड़ता था ॥ ३१ ॥ नागानश्वान् पदातींश्च रथिनो गजसादिनः । रौद्रा हस्तवता मुक्ताः प्रमथ्नन्ति स्म सायकाः ॥ ३२ ॥ शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले द्रोणाचार्यके छोड़े हुए भयंकर सायक हाथियों, घोड़ों, पैदलों, रथियों और गजारोहियोंको मथे डालते थे ॥ ३२ ॥ नानद्यमानः पर्जन्यो मिश्रवातो हिमात्यये । अश्मवर्षमिवावर्षत् परेषां भयमादधत् ॥ ३३ ॥ जैसे हेमन्त-ऋतुके अन्तमें अत्यन्त गर्जना करता हुआ वायुयुक्त मेघ पत्थरोंकी वर्षा करता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य शत्रुओंको भयभीत करते हुए उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करते थे ॥ ३३ ॥ सर्वा दिशः समचरत् सैन्यं विक्षोभयन्निव । बली शूरो महेष्वासो मित्राणामभयंकरः ॥ ३४ ॥ बलवान्, शूरवीर, महाधनुर्धर और मित्रोंको अभय प्रदान करनेवाले द्रोणाचार्य सारी सेनामें हलचल मचाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें विचर रहे थे ॥ ३४ ॥ तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चापं हेमपरिष्कृतम् । दिक्षु सर्वासु पश्यामो द्रोणस्यामिततेजसः ॥ ३५ ॥ जैसे बादलोंमें बिजली चमकती है, उसी प्रकार अमित तेजस्वी द्रोणाचार्यके सुवर्णभूषित धनुषको हम सम्पूर्ण दिशाओंमें चमकता हुआ देखते थे ॥ ३५ ॥ शोभमानां ध्वजे चास्य वेदीमद्राक्ष्म भारत । हिमवच्छिखराकारां चरतः संयुगे भृशम् ॥ ३६ ॥ भरतनन्दन! युद्धमें तीव्रवेगसे विचरते हुए आचार्यके ध्वजमें जो वेदीका चिह्न बना हुआ था, वह हमें हिमालयके शिखरकी भाँति शोभायमान दिखायी देता था ॥ ३६ ॥ द्रोणस्तु पाण्डवानीके चकार कदनं महत् । यथा दैत्यगणे विष्णुः सुरासुरनमस्कृतः ॥ ३७ ॥ जैसे देव-दानववन्दित भगवान् विष्णु दैत्योंकी सेनामें भयानक संहार मचाते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनामें भारी मारकाट मचा रखी थी ॥ ३७ ॥ स शूरः सत्यवाक् प्राज्ञो बलवान् सत्यविक्रमः । महानुभावः कल्पान्ते रौद्रां भीरुविभीषणाम् ॥ ३८ ॥ कवचोर्मिध्वजावर्तां मर्त्यकूलापहारिणीम् ।