महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 186, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंगजवाजिमहाग्राहामसिमीनां दुरासदाम् ।। ३९ ।।
वीरास्थिशर्करां रौद्रां भेरीमुरजकच्छपाम् ।
चर्मवर्मप्लवां घोरां केशशैवलशाद्वलाम् ।। ४० ।।
शरौघिणीं धनुःस्रोतां बाहुपन्नगसंकुलाम् ।
रणभूमिवहां तीव्रां कुरुसृञ्जयवाहिनीम् ।। ४१ ।।
मनुष्यशीर्षपाषाणां शक्तिमीनां गदोडुपाम् ।
उष्णीषफेनवसनां विकीर्णान्त्रसरीसृपाम् ।। ४२ ।।
वीरापहारिणीमुग्रां मांसशोणितकर्दमाम् ।
हस्तिग्राहां केतुवृक्षां क्षत्रियाणां निमज्जनीम् ।। ४३ ।।
क्रूरां शरीरसंघट्टां सादिनक्रां दुरत्ययाम् ।
द्रोणः प्रावर्तयत् तत्र नदीमन्तकगामिनीम् ।। ४४ ।।
क्रव्यादगणसंजुष्टां श्वशृगालगणायुताम् ।
निषेवितां महारौद्रैः पिशिताशैः समन्ततः ।। ४५ ।।
उन शौर्य-सम्पन्न, सत्यवादी, विद्वान्, बलवान् और सत्यपराक्रमी महानुभाव द्रोणने उस
युद्धस्थलमें रक्तकी भयंकर नदी बहा दी, जो प्रलयकालकी जलराशिके समान जान पड़ती
थी। वह नदी भीरु पुरुषोंको भयभीत करनेवाली थी। उसमें कवच लहरें और ध्वजाएँ भँवरें
थीं। वह मनुष्यरूपी तटोंको गिरा रही थी। हाथी और घोड़े उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राहोंके
समान थे। तलवारें मछलियाँ थीं। उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। वीरोंकी हड्डियाँ बालू
और कंकड़-सी जान पड़ती थीं। वह देखनेमें बड़ी भयानक थी। ढोल और नगाड़े उसके
भीतर कछुए-से प्रतीत होते थे। ढाल और कवच उसमें डोंगियोंके समान तैर रहे थे। वह
घोर नदी केशरूपी सेवार और घाससे युक्त थी। बाण ही उसके प्रवाह थे। धनुष स्रोतके
समान प्रतीत होते थे। कटी हुई भुजाएँ पानीके सर्पोंके समान वहाँ भरी हुई थीं। वह
रणभूमिके भीतर तीव्र वेगसे प्रवाहित हो रही थी। कौरव और सृंजय दोनोंको वह नदी
बहाये लिये जाती थी। मनुष्योंके मस्तक उसमें प्रस्तर-खण्डका भ्रम उत्पन्न करते थे।
शक्तियाँ मीनके समान थीं। गदाएँ नाक थीं। उष्णीषवस्त्र (पगड़ी) फेनके तुल्य चमक रहे
थे। बिखरी हुई आँतें सर्पाकार प्रतीत होती थीं। वीरोंका अपहरण करनेवाली वह उग्र नदी
मांस तथा रक्तरूपी कीचड़से भरी थी। हाथी उसके भीतर ग्राह थे। ध्वजाएँ वृक्षके तुल्य थीं।
वह नदी क्षत्रियोंको अपने भीतर डुबोनेवाली थी। वहाँ क्रूरता छा रही थी। शरीर (लाशें) ही
उसमें उतरनेके लिये घाट थे। योद्धागण मगर-जैसे जान पड़ते थे। उसको पार करना बहुत
कठिन था। वह नदी लोगोंको यमलोकमें ले जानेवाली थी। मांसाहारी जन्तु उसके आस-
पास डेरा डाले हुए थे। वहाँ कुत्ते और सियारोंके झुंड जुटे हुए थे। उसके सब ओर
महाभयंकर मांसभक्षी पिशाच निवास करते थे ।। ३८-४५ ।।
तं दहन्तमनीकानि रथोदारं कृतान्तवत् ।