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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

गजवाजिमहाग्राहामसिमीनां दुरासदाम् ।। ३९ ।।

वीरास्थिशर्करां रौद्रां भेरीमुरजकच्छपाम् ।

चर्मवर्मप्लवां घोरां केशशैवलशाद्वलाम् ।। ४० ।।

शरौघिणीं धनुःस्रोतां बाहुपन्नगसंकुलाम् ।

रणभूमिवहां तीव्रां कुरुसृञ्जयवाहिनीम् ।। ४१ ।।

मनुष्यशीर्षपाषाणां शक्तिमीनां गदोडुपाम् ।

उष्णीषफेनवसनां विकीर्णान्त्रसरीसृपाम् ।। ४२ ।।

वीरापहारिणीमुग्रां मांसशोणितकर्दमाम् ।

हस्तिग्राहां केतुवृक्षां क्षत्रियाणां निमज्जनीम् ।। ४३ ।।

क्रूरां शरीरसंघट्टां सादिनक्रां दुरत्ययाम् ।

द्रोणः प्रावर्तयत् तत्र नदीमन्तकगामिनीम् ।। ४४ ।।

क्रव्यादगणसंजुष्टां श्वशृगालगणायुताम् ।

निषेवितां महारौद्रैः पिशिताशैः समन्ततः ।। ४५ ।।

उन शौर्य-सम्पन्न, सत्यवादी, विद्वान्, बलवान् और सत्यपराक्रमी महानुभाव द्रोणने उस

युद्धस्थलमें रक्तकी भयंकर नदी बहा दी, जो प्रलयकालकी जलराशिके समान जान पड़ती

थी। वह नदी भीरु पुरुषोंको भयभीत करनेवाली थी। उसमें कवच लहरें और ध्वजाएँ भँवरें

थीं। वह मनुष्यरूपी तटोंको गिरा रही थी। हाथी और घोड़े उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राहोंके

समान थे। तलवारें मछलियाँ थीं। उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। वीरोंकी हड्डियाँ बालू

और कंकड़-सी जान पड़ती थीं। वह देखनेमें बड़ी भयानक थी। ढोल और नगाड़े उसके

भीतर कछुए-से प्रतीत होते थे। ढाल और कवच उसमें डोंगियोंके समान तैर रहे थे। वह

घोर नदी केशरूपी सेवार और घाससे युक्त थी। बाण ही उसके प्रवाह थे। धनुष स्रोतके

समान प्रतीत होते थे। कटी हुई भुजाएँ पानीके सर्पोंके समान वहाँ भरी हुई थीं। वह

रणभूमिके भीतर तीव्र वेगसे प्रवाहित हो रही थी। कौरव और सृंजय दोनोंको वह नदी

बहाये लिये जाती थी। मनुष्योंके मस्तक उसमें प्रस्तर-खण्डका भ्रम उत्पन्न करते थे।

शक्तियाँ मीनके समान थीं। गदाएँ नाक थीं। उष्णीषवस्त्र (पगड़ी) फेनके तुल्य चमक रहे

थे। बिखरी हुई आँतें सर्पाकार प्रतीत होती थीं। वीरोंका अपहरण करनेवाली वह उग्र नदी

मांस तथा रक्तरूपी कीचड़से भरी थी। हाथी उसके भीतर ग्राह थे। ध्वजाएँ वृक्षके तुल्य थीं।

वह नदी क्षत्रियोंको अपने भीतर डुबोनेवाली थी। वहाँ क्रूरता छा रही थी। शरीर (लाशें) ही

उसमें उतरनेके लिये घाट थे। योद्धागण मगर-जैसे जान पड़ते थे। उसको पार करना बहुत

कठिन था। वह नदी लोगोंको यमलोकमें ले जानेवाली थी। मांसाहारी जन्तु उसके आस-

पास डेरा डाले हुए थे। वहाँ कुत्ते और सियारोंके झुंड जुटे हुए थे। उसके सब ओर

महाभयंकर मांसभक्षी पिशाच निवास करते थे ।। ३८-४५ ।।

तं दहन्तमनीकानि रथोदारं कृतान्तवत् ।

सर्वतोऽभ्यद्रवन् द्रोणं कुन्तीपुत्रपुरोगमाः ॥ ४६ ॥
समस्त सेनाओंको दग्ध करनेवाले यमराजके समान भयंकर उदार महारथी द्रोणाचार्यपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर आदि सब वीर सब ओरसे टूट पड़े ॥ ४६ ॥
ते द्रोणं सहिताः शूराः सर्वतः प्रत्यवारयन् ।
गभस्तिभिरिवादित्यं तपन्तं भुवनं यथा ॥ ४७ ॥
उन सभी शूरवीरोंने एक साथ आकर द्रोणाचार्यको सब ओरसे उसी प्रकार घेर लिया, जैसे जगत्‌को तपानेवाले भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे घिरे रहते हैं ॥ ४७ ॥
तं तु शूरं महेष्वासं तावकाऽभ्युद्यतायुधाः ।
राजानो राजपुत्राश्च समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ४८ ॥
आपकी सेनाके राजा और राजकुमारोंने अस्त्र-शस्त्र लेकर उन शौर्यसम्पन्न महाधनुर्धर द्रोणाचार्यको उनकी रक्षाके लिये सब ओरसे घेर रखा था ॥ ४८ ॥
शिखण्डी तु ततो द्रोणं पञ्चभिर्नतपर्वभिः ।
क्षत्रवर्मा च विंशत्या वसुदानश्च पञ्चभिः ॥ ४९ ॥
उत्तमौजास्त्रिभिर्बाणैः क्षत्रदेवश्च सप्तभिः ।
सात्यकिश्च शतेनाजौ युधामन्युस्तथाष्टभिः ॥ ५० ॥
युधिष्ठिरो द्वादशभिर्द्रोणं विव्याध सायकैः ।
धृष्टद्युम्नश्च दशभिश्चेकितानस्त्रिभिः शरैः ॥ ५१ ॥
उस समय शिखण्डीने झुकी हुई गाँठवाले पाँच बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको बींध डाला। तत्पश्चात् क्षत्रवर्माने बीस, वसुदानने पाँच, उत्तमौजाने तीन, क्षत्रदेवने सात, सात्यकिने सौ, युधामन्युने आठ और युधिष्ठिरने बारह बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। धृष्टद्युम्नने दस और चेकितानने उन्हें तीन बाण मारे ॥ ४९—५१ ॥
ततो द्रोणः सत्यसंधः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ।
अभ्यतीत्य रथानीकं दृढसेनमपातयत् ॥ ५२ ॥
तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ द्रोणने मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति रथ-सेनाको लाँघकर दृढसेनको मार गिराया ॥ ५२ ॥
ततो राजानमासाद्य प्रहरन्तमभीतवत् ।
अविध्यन्नवभिः क्षेमं स हतः प्रापतद् रथात् ॥ ५३ ॥
फिर निर्भय-से प्रहार करते हुए राजा क्षेमके पास पहुँचकर उन्हें नौ बाणोंसे बींध डाला। उन बाणोंसे मारे जाकर वे रथसे नीचे गिर गये ॥ ५३ ॥
स मध्यं प्राप्य सैन्यानां सर्वाः प्रविचरन् दिशः ।
त्राता ह्यभवदन्येषां न त्रातव्यः कथञ्चन ॥ ५४ ॥
यद्यपि वे शत्रुसेनाके भीतर घुसकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचर रहे थे, तथापि वे ही दूसरोंके रक्षक थे, स्वयं किसी प्रकार किसीके रक्षणीय नहीं हुए ॥ ५४ ॥

शिखण्डिनं द्वादशभिर्विंशत्या चोत्तमौजसम् । वसुदानं च भल्लेन प्रैषयद् यमसादनम् ॥ ५५ ॥ उन्होंने शिखण्डीको बारह और उत्तमौजाको बीस बाणोंसे घायल करके वसुदानको एक ही भल्लसे मारकर यमलोक भेज दिया ॥ ५५ ॥

अशीत्या क्षत्रवर्माणं षड्विंशत्या सुदक्षिणम् । क्षत्रदेवं तु भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ ५६ ॥ तत्पश्चात् क्षत्रवर्माको अस्सी और सुदक्षिणको छब्बीस बाणोंसे आहत करके क्षत्रदेवको भल्लसे घायलकर रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ५६ ॥

युधामन्युं चतुःषष्ट्या त्रिंशता चैव सात्यकिम् । विद्ध्वा रुक्मरथस्तूर्णं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ५७ ॥ युधामन्युको चौसठ तथा सात्यकिको तीस बाणोंसे घायल करके सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य राजा युधिष्ठिरकी ओर दौड़े ॥ ५७ ॥

ततो युधिष्ठिरः क्षिप्रं गुरुतो राजसत्तमः । अपायाज्जवनैरश्वैः पाञ्चाल्यो द्रोणमभ्ययात् ॥ ५८ ॥ तब राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर गुरुके निकटसे तीव्रगामी अश्वोंद्वारा शीघ्र ही दूर चले गये और पांचाल देशका एक राजकुमार द्रोणका सामना करनेके लिये आगे बढ़ आया ॥ ५८ ॥

तं द्रोणः सधनुष्कं तु साश्वयन्तारमाक्षिणोत् । स हतः प्रापतद् भूमौ रथाज्ज्योतिरिवाम्बरात् ॥ ५९ ॥ परंतु द्रोणने धनुष, घोड़े और सारथिसहित उसे क्षत-विक्षत कर दिया। उनके द्वारा मारा गया वह राजकुमार आकाशसे उल्काकी भाँति रथसे भूमिपर गिर पड़ा ॥ ५९ ॥

तस्मिन् हते राजपुत्रे पञ्चालानां यशस्करे । हत द्रोणं हत द्रोणमित्यासीन्निःस्वनो महान् ॥ ६० ॥ पांचालोंका यश बढ़ानेवाले उस राजकुमारके मारे जानेपर वहाँ ‘द्रोणको मार डालो, द्रोणको मार डालो’ इस प्रकार महान् कोलाहल होने लगा ॥ ६० ॥

तांस्तथा भृशसंरब्धान् पञ्चालान् मत्स्यकेकयान् । सृञ्जयान् पाण्डवांश्चैव द्रोणो व्यक्षोभयद् बली ॥ ६१ ॥ इस प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए पांचाल, मत्स्य, केकय, सृंजय और पाण्डव योद्धाओंको बलवान् द्रोणाचार्यने क्षोभमें डाल दिया ॥ ६१ ॥

सात्यकिं चेकितानं च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ । वार्धक्षेमिं चैत्रसेनिं सेनाबिन्दुं सुवर्चसम् ॥ ६२ ॥ एतांश्चान्यांश्च सुबहून् नानाजनपदेश्वरान् । सर्वान् द्रोणोऽजयद् युद्धे कुरुभिः परिवारितः ॥ ६३ ॥

कौरवोंसे घिरे हुए द्रोणाचार्यने युद्धमें सात्यकि, चेकितान, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, वृद्धक्षेमके पुत्र, चित्रसेनकुमार, सेनाबिन्दु तथा सुवर्चा—इन सबको तथा अन्य बहुत-से विभिन्न देशोंके राजाओंको परास्त कर दिया ।। ६२-६३ ।।

तावकाश्च महाराज जयं लब्ध्वा महाहवे ।
पाण्डवेयान् रणे जघ्नुर्द्रवमाणान् समन्ततः ।। ६४ ।।
महाराज! आपके पुत्रोंने उस महासमरमें विजय प्राप्त करके सब ओर भागते हुए पाण्डव-योद्धाओंको मारना आरम्भ किया ।। ६४ ।।

ते दानवा इवेन्द्रेण वध्यमाना महात्मना ।
पञ्चालाः केकया मत्स्याः समकम्पन्त भारत ।। ६५ ।।
भरतनन्दन! इन्द्रके द्वारा मारे जानेवाले दानवोंकी भाँति महामना द्रोणकी मार खाकर पांचाल, केकय और मत्स्यदेशके सैनिक काँपने लगे ।। ६५ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्रोणयुद्धे एकविंशोऽध्यायः ।। २१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें द्रोणाचार्यका युद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१ ।।

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द्वाविंशोऽध्यायः

द्रोणके युद्धके विषयमें दुर्योधन और कर्णका संवाद

धृतराष्ट्र उवाच

भारद्वाजेन भग्नेषु पाण्डवेषु महामृधे ।
पञ्चालेषु च सर्वेषु कच्चिदन्योऽभ्यवर्तत ॥ १ ॥
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा क्षत्रियाणां यशस्करीम् ।
असेवितां कापुरुषैः सेवितां पुरुषर्षभैः ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! द्रोणाचार्यने उस महासमरमें जब पाण्डवों तथा समस्त पांचालोंको मार भगाया, तब क्षत्रियोंके लिये यशका विस्तार करनेवाली, कायरोंद्वारा न अपनायी जानेवाली और श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सेवित युद्धविषयक उत्तम बुद्धिका आश्रय लेकर क्या कोई दूसरा वीर भी उनके सामने आया? ॥ १-२ ॥

स हि वीरोन्नतः शूरो यो भग्नेषु निवर्तते ।
अहो नासीत् पुमान् कश्चिद् दृष्ट्वा द्रोणं व्यवस्थितम् ॥ ३ ॥
वही वीरोंमें उन्नतिशील और शौर्यसम्पन्न है, जो सैनिकोंके भाग जानेपर स्वयं युद्धक्षेत्रमें लौटकर आ जाय। अहो! क्या उस समय द्रोणाचार्यको डटा हुआ देखकर पाण्डवोंमें कोई भी वीर पुरुष नहीं था (जो द्रोणाचार्यका सामना कर सके) ॥ ३ ॥

जृम्भमाणमिव व्याघ्रं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् ।
त्यजन्तमाहवे प्राणान् संनद्धं चित्रयोधिनम् ॥ ४ ॥
महेष्वासं नरव्याघ्रं द्विषतां भयवर्धनम् ।
कृतज्ञं सत्यनिरतं दुर्योधनहितैषिणम् ॥ ५ ॥
भारद्वाजं तथानीके दृष्ट्वा शूरमवस्थितम् ।
के शूराः संन्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ६ ॥
जँभाई लेते हुए व्याघ्र तथा मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति पराक्रमी, युद्धमें प्राणोंका विसर्जन करनेके लिये उद्यत, कवच आदिसे सुसज्जित, विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले, शत्रुओंका भय बढ़ानेवाले, कृतज्ञ, सत्यपरायण, दुर्योधनके हितैषी तथा शूरवीर, भरद्वाजनन्दन महाधनुर्धर पुरुषसिंह द्रोणाचार्यको युद्धमें डटा हुआ देख किन शूरवीरोंने लौटकर उनका सामना किया? संजय! यह वृत्तान्त मुझसे कहो ॥ ४—६ ॥

संजय उवाच

तान् दृष्ट्वा चलितान् संख्ये प्रणुन्नान् द्रोणसायकैः ।
पञ्चालान् पाण्डवान् मत्स्यान् सृञ्जयांश्चेदिकेकयान् ॥ ७ ॥

द्रोणचापविमुक्तेन शरौघेनाशुहारिणा । सिन्धोरिव महौघेन ह्रियमाणान् यथा प्लवान् ॥ ८ ॥ कौरवाः सिंहनादेन नानावाद्यस्वनेन च । रथद्विपनरांश्चैव सर्वतः समवारयन् ॥ ९ ॥ **संजयने कहा—**महाराज! कौरवोंने देखा कि पांचाल, पाण्डव, मत्स्य, सृंजय, चेदि और केकय-देशीय योद्धा युद्धमें द्रोणाचार्यके बाणोंसे पीड़ित हो विचलित हो उठे हैं तथा जैसे समुद्रकी महान् जलराशि बहुत-से नावोंको बहा ले जाती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटकर शीघ्र ही प्राण हर लेनेवाले बाण-समुदायने पाण्डव-सैनिकोंको मार भगाया है। तब वे सिंहनाद एवं नाना प्रकारके रण-वाद्योंका गम्भीर घोष करते हुए शत्रुओंके रथानारोहियों, हाथीसवारों तथा पैदल सैनिकोंको सब ओरसे रोकने लगे ॥ ७—९ ॥ तान् पश्यन् सैन्यमध्यस्थो राजा स्वजनसंवृतः । दुर्योधनोऽब्रवीत् कर्णं प्रहृष्टः प्रहसन्निव ॥ १० ॥ सेनाके बीचमें खड़े हो स्वजनोंसे घिरे हुए राजा दुर्योधनने पाण्डव-सैनिकोंकी ओर देखते हुए अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णसे हँसते हुए-से कहा ॥ १० ॥

दुर्योधन उवाच

पश्य राधेय पञ्चालान् प्रणुन्नान् द्रोणसायकैः । सिंहेनेव मृगान् वन्यांस्त्रासितान् दृढधन्वना ॥ ११ ॥ **दुर्योधन बोला—**राधानन्दन! देखो, सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले द्रोणाचार्यके बाणोंसे ये पांचाल सैनिक उसी प्रकार पीड़ित हो रहे हैं, जैसे सिंह वनवासी मृगोंको त्रस्त कर देता है ॥ ११ ॥ नैते जातु पुनर्युद्धमीहेयुरिति मे मतिः । यथा तु भग्ना द्रोणेन वातेनेव महाद्रुमाः ॥ १२ ॥ मेरा तो ऐसा विश्वास है कि ये फिर कभी युद्धकी इच्छा नहीं करेंगे। जैसे वायु बड़े-बड़े वृक्षोंको उखाड़ देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने युद्धसे इनके पाँव उखाड़ दिये हैं ॥ १२ ॥ अर्द्यमानाः शरैरेते रुक्मपुङ्खैर्महात्मना । पथा नैकेन गच्छन्ति घूर्णमानास्ततस्ततः ॥ १३ ॥ महामना द्रोणके सुवर्णमय पंखयुक्त बाणोंद्वारा पीड़ित होकर ये इधर-उधर चक्कर काटते हुए एक ही मार्गसे नहीं भाग रहे हैं ॥ १३ ॥ संनिरुद्धाश्च कौरव्यैर्द्रोणेन च महात्मना । एतेऽन्ये मण्डलीभूताः पावकेनेव कुञ्जराः ॥ १४ ॥ कौरव-सैनिकों तथा महामना द्रोणने इनकी गति रोक दी है। जैसे दावानलसे हाथी घिर जाते हैं, उसी प्रकार ये तथा अन्य पाण्डव-योद्धा कौरवोंसे घिर गये हैं ॥ १४ ॥

भ्रमरैरिव चाविष्टा द्रोणस्य निशितैः शरैः ।
अन्योन्यं समलीयन्त पलायनपरायणाः ॥ १५ ॥
भ्रमरोंके समान द्रोणके पैने बाणोंसे घायल होकर ये रणभूमिसे पलायन करते हुए एक-दूसरेकी आडमें छिप रहे हैं ॥ १५ ॥
एष भीमो महाक्रोधी हीनः पाण्डवसृञ्जयैः ।
मदीयैरावृतो योधैः कर्ण नन्दयतीव माम् ॥ १६ ॥
यह महाक्रोधी भीमसेन पाण्डव तथा सृञ्जयोंसे रहित हो मेरे योद्धाओंसे घिर गया है। कर्ण! इस अवस्थामें भीमसेन मुझे आनन्दित-सा कर रहा है ॥ १६ ॥
व्यक्तं द्रोणमयं लोकमद्य पश्यति दुर्मतिः ।
निराशो जीवितान्नूनमद्य राज्याच्च पाण्डवः ॥ १७ ॥
निश्चय ही आज जीवन और राज्यसे निराश हो यह दुर्बुद्धि पाण्डुकुमार सारे संसारको द्रोणमय ही देख रहा होगा ॥ १७ ॥

कर्ण उवाच

नैष जातु महाबाहुर्जीवन्नाहवमुत्सृजेत् ।
न चेमान् पुरुषव्याघ्र सिंहनादान् सहिष्यति ॥ १८ ॥
कर्ण बोला— राजन्! यह महाबाहु भीमसेन जीतेजी कभी युद्ध नहीं छोड़ सकता है। पुरुषसिंह! तुम्हारे सैनिक जो ये सिंहनाद कर रहे हैं, इन्हें भीमसेन कभी नहीं सहेगा ॥ १८ ॥
न चापि पाण्डवा युद्धे भज्येरन्निति मे मतिः ।
शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ १९ ॥
पाण्डव शूरवीर, बलवान्, अस्त्र-विद्यामें निपुण तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं। ये रणभूमिसे कभी भाग नहीं सकते हैं। मेरा यही विश्वास है ॥ १९ ॥
विषाग्निद्यूतसंक्लेशान् वनवासं च पाण्डवाः ।
स्मरमाणा न हास्यन्ति संग्राममिति मे मतिः ॥ २० ॥
मैं ऐसा मानता हूँ कि पाण्डव तुम्हारे द्वारा दिये हुए विष, अग्निदाह और द्यूतके क्लेशों तथा वनवासको याद करके कभी युद्धभूमि नहीं छोड़ेंगे ॥ २० ॥
निवृत्तो हि महाबाहुरमितौजा वृकोदरः ।
वरान् वरान् हि कौन्तेयो रथोदारान् हनिष्यति ॥ २१ ॥
अमिततेजस्वी महाबाहु कुन्तीपुत्र वृकोदर इधरकी ओर लौटे हैं। वे बड़े-बड़े उदार महारथियोंको चुन-चुनकर मारेंगे ॥ २१ ॥
असिना धनुषा शक्त्या हयैर्नागैर्नरै रथैः ।
आयसेन च दण्डेन व्रातान् व्रातान् हनिष्यति ॥ २२ ॥

वे खड्ग, धनुष, शक्ति, घोड़े, हाथी, मनुष्य एवं रथोंद्वारा और लोहेके डंडेसे समूह-के-समूह सैनिकोंका संहार कर डालेंगे ॥ २२ ॥ तमेनमनुवर्तन्ते सात्यकिप्रमुखा रथाः । पञ्चालाः केकया मत्स्याः पाण्डवाश्च विशेषतः ॥ २३ ॥ देखो, भीमसेनके पीछे सात्यकि आदि महारथी तथा पांचाल, केकय, मत्स्य और विशेषतः पाण्डव योद्धा भी आ रहे हैं ॥ २३ ॥ शूराश्च बलवन्तश्च विक्रान्ताश्च महारथाः । विनिघ्नन्तश्च भीमेन संरब्धेनाभिचोदिताः ॥ २४ ॥ क्रोधमें भरे हुए भीमसेनसे प्रेरित हो वे शूरवीर, बलवान् पराक्रमी महारथी सैनिक हमारे सैनिकोंको मारते आ रहे हैं ॥ २४ ॥ ते द्रोणमभिवर्तन्ते सर्वतः कुरुपुङ्गवाः । वृकोदरं परीप्सन्तः सूर्यमभ्रगणा इव ॥ २५ ॥ वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डव भीमसेनकी रक्षाके लिये द्रोणाचार्यको सब ओरसे उसी प्रकार घेर रहे हैं, जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं ॥ २५ ॥ (समरेषु तु निर्दिष्टाः पाण्डवाः कृष्णबान्धवाः । ह्रीमन्तः शत्रुमरणे निपुणाः पुण्यलक्षणाः ॥ बहवः पार्थिवा राजंस्तेषां वशगता रणे । मावमंस्थाः पाण्डवांस्त्वं नारायणपुरोगमान् ॥) राजन्! पाण्डवोंके सहायक बन्धु श्रीकृष्ण हैं। वे उन्हें युद्धविषयक कर्तव्यका निर्देश किया करते हैं। वे लज्जाशील, शत्रुओंको मारनेकी कलामें निपुण तथा पवित्र लक्षणोंसे युक्त हैं। रणभूमिमें बहुत-से भूपाल उनके वशमें आ चुके हैं। अतः भगवान् नारायण जिनके अगुआ हैं, उन पाण्डवोंकी तुम अवहेलना न करो। एकायनगता ह्येते पीडयेयुर्धृतव्रतम् । अरक्ष्यमाणं शलभा यथा दीपं मुमूर्षवः ॥ २६ ॥ ये सब एक रास्तेपर चल रहे हैं। यदि व्रत और नियमका पालन करनेवाले द्रोणाचार्यकी रक्षा न की गयी तो ये उन्हें उसी प्रकार पीड़ा देंगे, जैसे मरनेकी इच्छावाले पतंग दीपकको बुझा देनेकी चेष्टा करते हैं ॥ २६ ॥ असंशयं कृतास्त्राश्च पर्याप्ताश्चापि वारणे । अतिभारमहं मन्ये भारद्वाजे समाहितम् ॥ २७ ॥ इसमें संदेह नहीं कि वे पाण्डव योद्धा अस्त्र-विद्यामें निपुण तथा द्रोणाचार्यकी गतिको रोकनेमें समर्थ हैं। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि इस समय भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यपर बहुत बड़ा भार आ पहुँचा है ॥ २७ ॥ शीघ्रमनुगमिष्यामो यत्र द्रोणो व्यवस्थितः ।

कोका इव महानागं मा वै हन्युर्यतव्रतम् ॥ २८ ॥ अतः हमलोग शीघ्र वहीं चलें, जहाँ द्रोणाचार्य खड़े हैं। कहीं ऐसा न हो कि कुछ भेड़िये (जैसे पाण्डव-सैनिक) महान् गजराज-जैसे व्रतधारी द्रोणाचार्यका वध कर डालें ॥ २८ ॥

संजय उवाच राधेयस्य वचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्ततः । भ्रातृभिः सहितो राजन् प्रायाद् द्रोणरथं प्रति ॥ २९ ॥ संजय कहते हैं— महाराज! राधानन्दन कर्णकी बात सुनकर राजा दुर्योधन अपने भाइयोंके साथ द्रोणाचार्यके रथकी ओर चल दिया ॥ २९ ॥

तत्रारावो महानासीदेकं द्रोणं जिघांसताम् । पाण्डवानां निवृत्तानां नानावर्णैर्हयोत्तमैः ॥ ३० ॥ वहाँ अनेक प्रकारके रंगवाले उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए रथोंद्वारा एकमात्र द्रोणाचार्यको मार डालनेकी इच्छासे लौटे हुए पाण्डव-सैनिकोंका महान् कोलाहल प्रकट हो रहा था ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्रोणयुद्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें द्रोणाचार्यका युद्धविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं।)

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त्रयोविंशोऽध्यायः

पाण्डव-सेनाके महारथियोंके रथ, घोड़े, ध्वज तथा धनुषोंका विवरण

धृतराष्ट्र उवाच

सर्वेषामेव मे ब्रूहि रथचिह्नानि संजय ।
ये द्रोणमभ्यवर्तन्त क्रुद्धा भीमपुरोगमाः ॥ १ ॥

**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! क्रोधमें भरे हुए भीमसेन आदि जो योद्धा द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर रहे थे, उन सबके रथोंके (घोड़े-ध्वजा आदि) चिह्न कैसे थे? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥

संजय उवाच

ऋक्षवर्णैर्हयैर्दृष्ट्वा व्यायच्छन्तं वृकोदरम् ।
रजताश्वस्ततः शूरः शैनेयः संन्यवर्तत ॥ २ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! रीछके समान रंगवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर भीमसेनको आते देख चाँदीके समान श्वेत घोड़ोंवाले शूरवीर सात्यकि भी लौट पड़े ॥ २ ॥

सारङ्गाश्वो युधामन्युः स्वयं प्रत्वरयन् हयान् ।
पर्यवर्तत दुर्धर्षः क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ॥ ३ ॥

सारंगके³ समान (सफेद, नीले और लाल) रंगके घोड़ोंसे युक्त युधामन्यु, स्वयं ही अपने घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक हाँकता हुआ द्रोणाचार्यके रथकी ओर लौट पड़ा। वह दुर्जय वीर क्रोधमें भरा हुआ था ॥ ३ ॥

पारावतसवर्णैस्तु हेमभाण्डैर्महाजवैः ।
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नो न्यवर्तत ॥ ४ ॥

पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न कबूतरके³ समान (सफेद और नीले) रंगवाले सुवर्णभूषित एवं अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा लौट आया ॥ ४ ॥

पितरं तु परिप्रेप्सुः क्षत्रधर्मा यतव्रतः ।
सिद्धिं चास्य परां काङ्क्षन् शोणाश्वः संन्यवर्तत ॥ ५ ॥

नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाला क्षत्रधर्मा अपने पिता धृष्टद्युम्नकी रक्षा और उनके अभीष्ट मनोरथकी उत्तम सिद्धि चाहता हुआ लाल रंगके घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ हो लौट आया ॥ ५ ॥

पद्मपत्रनिभांश्चाश्वान् मल्लिकाक्षान् स्वलंकृतान् ।

शिखण्डिः क्षत्रदेवस्तु स्वयं प्रत्वरयन् ययौ ॥ ६ ॥ शिखण्डीका पुत्र क्षत्रदेव, कमलपत्रके समान रंग तथा निर्मल नेत्रोंवाले सजे-सजाये घोड़ोंको स्वयं ही शीघ्रतापूर्वक हाँकता हुआ वहाँ आया ॥ ६ ॥

दर्शनीयास्तु काम्बोजाः शुकपत्रपरिच्छदाः । वहन्तो नकुलं शीघ्रं तावकानभिदुद्रुवुः ॥ ७ ॥ तोतेकी पाँखके समान रोमवाले दर्शनीय काम्बोजदेशीय³ घोड़े नकुलको वहन करते हुए बड़ी शीघ्रताके साथ आपके सैनिकोंकी ओर दौड़े ॥ ७ ॥

कृष्णास्तु मेघसंकाशा अवहन्नुत्तमौजसम् । दुर्धर्षायाभिसंधाय क्रुद्धं युद्धाय भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! दुर्धर्ष युद्धका संकल्प लेकर क्रोधमें भरे हुए उत्तमौजाको मेघके समान श्यामवर्णवाले घोड़े युद्धस्थलकी ओर ले जा रहे थे ॥ ८ ॥

तथा तित्तिरिकल्माषा हया वातसमा जवे । अवहंस्तुमुले युद्धे सहदेवमुदायुधम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न सहदेवको तीतरके समान चितकबरे रंगवाले तथा वायुके समान वेगशाली घोड़े उस भयंकर युद्धमें ले गये ॥ ९ ॥

दन्तवर्णास्तु राजानं कालवाला युधिष्ठिरम् । भीमवेगा नरव्याघ्रमवहन् वातरंहसः ॥ १० ॥ हाथीके दाँतके समान सफेद रंग, काली पूँछ तथा वायुके समान तीव्र एवं भयंकर वेगवाले घोड़े नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरको रणक्षेत्रमें ले गये ॥ १० ॥

हेमोत्तमप्रतिच्छन्नैर्हयैर्वातसमैर्जवे । अभ्यवर्तन्त सैन्यानि सर्वाण्येव युधिष्ठिरम् ॥ ११ ॥ सोनेके उत्तम आवरणोंसे ढके हुए, वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा सारी सेनाओंने महाराज युधिष्ठिरको सब ओरसे घेर रखा था ॥ ११ ॥

राजंस्त्वनन्तरो राजा पाञ्चाल्यो द्रुपदोऽभवत् । जातरूपमयच्छत्रः सर्वैस्तैरभिरक्षितः ॥ १२ ॥ राजा युधिष्ठिरके पीछे पांचालराज द्रुपद चल रहे थे। उनका छत्र सोनेका बना हुआ था। वे भी समस्त सैनिकोंद्वारा सुरक्षित थे ॥ १२ ॥

ललामैर्हरिभिर्युक्तः सर्वशब्दक्षमैर्युधि । राज्ञां मध्ये महेष्वासः शान्तभीरभ्यवर्तत ॥ १३ ॥ वे 'ललाम'¹ और 'हरि'² संज्ञावाले घोड़ोंसे, जो सब प्रकारके शब्दोंको सुनकर उन्हें सहन करनेमें समर्थ थे, सुशोभित हो रहे थे। उस युद्धस्थलमें

समस्त राजाओंके मध्यभागमें महाधनुर्धर राजा द्रुपद निर्भय होकर द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये आये ।। १३ ।। तं विराटोऽन्वयाच्छीघ्रं सह सर्वैर्महारथैः । केकयाश्च शिखण्डी च धृष्टकेतुस्तथैव च ।। १४ ।। स्वैः स्वैः सैन्यैः परिवृता मत्स्यराजानमन्वयुः । द्रुपदके पीछे सम्पूर्ण महारथियोंके साथ राजा विराट शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे। केकयराजकुमार, शिखण्डी तथा धृष्टकेतु—ये अपनी-अपनी सेनाओंसे घिरकर मत्स्यराज विराटके पीछे चल रहे थे ।। १४ १/२ ।। तं तु पाटलिपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः ।। १५ ।। वहमाना व्यराजन्त मत्स्यस्यामित्रघातिनः । शत्रुसूदन मत्स्यराज विराटके रथको जो वहन करते हुए शोभा पा रहे थे, वे उत्तम घोड़े पाडरके फूलोंके समान लाल और सफेद रंगवाले थे ।। १५ १/२ ।। हरिद्रासमवर्णास्तु जवना हेममालिनः ।। १६ ।। पुत्रं विराटराजस्य सत्वरं समुदावहन् । हल्दीके समान पीले रंगवाले तथा सुवर्णमय माला धारण करनेवाले वेगशाली घोड़े विराटराजके पुत्रको शीघ्रतापूर्वक रणभूमिकी ओर ले जा रहे थे ।। १६ १/२ ।। इन्द्रगोपकवर्णैश्च भ्रातरः पञ्च केकयाः ।। १७ ।। जातरूपसमाभासाः सर्वे लोहितकध्वजाः । पाँच भाई केकयराजकुमार इन्द्रगोप (वीरबहूटी)-के समान रंगवाले घोड़ोंद्वारा रणभूमिमें लौट रहे थे। उन पाँचों भाइयोंकी कान्ति सुवर्णके समान थी तथा वे सब-के-सब लाल रंगकी ध्वजा-पताका धारण किये हुए थे ।। १७ १/२ ।। ते हेममालिनः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ।। १८ ।। वर्षन्त इव जीमूताः प्रत्यदृश्यन्त दंशिताः । सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित वे सभी युद्धविशारद शूरवीर मेघोंके समान बाण-वर्षा करते हुए कवच आदिसे सुसज्जित दिखायी देते थे ।। १८ १/२ ।। आमपात्रनिकाशास्तु पांचाल्यममितौजसम् ।। १९ ।। दत्तास्तुम्बुरुणा दिव्याः शिखण्डिनमुदावहन् । अमित तेजस्वी पांचालराजकुमार शिखण्डीको तुम्बुरुके दिये हुए मिट्टीके कच्चे बर्तनके समान रंगवाले दिव्य अश्व वहन करते थे ।। १९ १/२ ।। तथा द्वादश साहस्त्राः पञ्चालानां महारथाः ।। २० ।।

तेषां तु षट् सहस्राणि ये शिखण्डिनमन्वयुः ।
पाञ्चालोंके जो बारह हजार महारथी युद्धमें लड़ रहे थे, उनमेंसे छः हजार इस समय शिखण्डीके पीछे चलते थे ॥ २० १/२ ॥
पुत्रं तु शिशुपालस्य नरसिंहस्य मारिष ॥ २१ ॥
आक्रीडन्तो वहन्ति स्म सारङ्गशबला हयाः ।
आर्य! पुरुषसिंह शिशुपालके पुत्रके सारंगके समान चितकबरे अश्व खेल करते हुए-से वहन कर रहे थे ॥ २१ १/२ ॥
धृष्टकेतुस्तु चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः ॥ २२ ॥
काम्बोजैः शबलैरश्वैरभ्यवर्तत दुर्जयः ।
चेदिदेशका श्रेष्ठ राजा अत्यन्त बलवान् दुर्जय वीर धृष्टकेतु काम्बोजदेशीय चितकबरे घोड़ोंद्वारा युद्धभूमिकी ओर लौट रहा था ॥ २२ १/२ ॥
बृहत्क्षत्रं तु कैकेयं सुकुमारं हयोत्तमाः ॥ २३ ॥
पलालधूमसंकाशाः सैन्धवाः शीघ्रमावहन् ।
केकयदेशके सुकुमार राजकुमार बृहत्क्षत्रको पुआलके धूएँके समान उज्ज्वल-नील वर्णवाले सिन्धुदेशीय¹ अच्छी जातिके घोड़ोंने शीघ्रतापूर्वक रणभूमिमें पहुँचाया ॥
मल्लिकाक्षाः पद्मवर्णा बाह्लिजाताः स्वलंकृताः ॥ २४ ॥
शूरं शिखण्डिनः पुत्रमृक्षदेवमुदावहन् ।
शिखण्डीके शूरवीर पुत्र ऋक्षदेवको पद्मके² समान वर्ण और निर्मल नेत्रवाले बाह्लिक³ देशके सजे-सजाये घोड़ोंने रणभूमिमें पहुँचाया ॥ २४ १/२ ॥
रुक्मभाण्डप्रतिच्छन्नाः कौशेयसदृशा हराः ॥ २५ ॥
क्षमावन्तोऽवहन् संख्ये सेनाबिन्दुमरिंदमम् ।
सोनेके आभूषणों तथा कवचोंसे सुशोभित रेशमके समान श्वेत-पीत रोमवाले सहनशील घोड़ोंने शत्रुओंका दमन करनेवाले सेनाबिन्दुको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ २५ १/२ ॥
युवानमवहन् युद्धे क्रौञ्चवर्णा हयोत्तमाः ॥ २६ ॥
काश्यस्याभिभुवः पुत्रं सुकुमारं महारथम् ।
क्रौंचवर्णक⁴ उत्तम घोड़ोंने काशिराज अभिभूके सुकुमार एवं युवा पुत्रको, जो महारथी वीर था, युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ २६ १/२ ॥
श्वेतास्तु प्रतिविन्ध्यं तं कृष्णग्रीवा मनोजवाः ।
यन्तुः प्रेष्यकरा राजन् राजपुत्रमुदावहन् ॥ २७ ॥

राजन्! मनके समान वेगशाली तथा काली गर्दनवाले श्वेतवर्णके घोड़े, जो सारथिकी आज्ञा माननेवाले थे, राजकुमार प्रतिविन्ध्यको रणमें ले गये ॥ २७ ॥ सुतसोमं तु यः सौम्यं पार्थः पुत्रमजीजनत् । माषपुष्पसवर्णास्तमवहन् वाजिनो रणे ॥ २८ ॥ कुन्तीकुमार भीमसेनने जिस सौम्यरूपवाले पुत्र सुतसोमको जन्म दिया था, उसे उड़दके फूलकी भाँति सफेद और पीले रंगवाले घोड़ोंने रणक्षेत्रमें पहुँचाया ॥ सहस्रसोमप्रतिमो बभूव पुरे कुरूणामुदयेन्दुनाम्नि । तस्मिंजात: सोमसंक्रन्दमध्ये यस्मात् तस्मात् सुतसोमोऽभवत् सः ॥ २९ ॥ कौरवोंके उदयेन्दु नामक पुर (इन्द्रप्रस्थ) में सोमाभिषव (सोमरस निकालने) के दिन सहस्रों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमान् वह बालक उत्पन्न हुआ था, इसलिये उसका नाम सुतसोम रखा गया था ॥ २९ ॥ नाकुलिं तु शतानीकं शालपुष्पनिभा हयाः । आदित्यतरुणप्रख्याः श्लाघनीयमुदावहन् ॥ ३० ॥ नकुलके स्पृहणीय पुत्र शतानीकको शालपुष्पके समान रक्त-पीतवर्णवाले और बालसूर्यके समान कान्तिमान् अश्व रणभूमिमें ले गये ॥ ३० ॥ काञ्चनापिहितैर्युक्तैर्मयूरग्रीवसंनिभाः । द्रौपदेयं नरव्याघ्रं श्रुतकर्माणमाहवे ॥ ३१ ॥ मोरकी गर्दनके समान नीले रंगवाले घोड़ोंने सुनहरी रस्सियोंसे आबद्ध हो द्रौपदीपुत्र सहदेवकुमार पुरुषसिंह श्रुतकर्माको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ ३१ ॥ श्रुतकीर्तिं श्रुतनिधिं द्रौपदेयं हयोत्तमाः । ऊहुः पार्थसमं युद्धे चाषपत्रनिभा हयाः ॥ ३२ ॥ इसी प्रकार युद्धमें अर्जुनकी समानता करनेवाले, शास्त्रज्ञानके भण्डार द्रौपदीनन्दन अर्जुनकुमार श्रुतकीर्तिको नीलकण्ठकी पाँखके समान रंगवाले उत्तम घोड़े रणक्षेत्रमें ले गये ॥ ३२ ॥ यमाहुरर्ध्यर्धगुणं कृष्णात् पार्थाच्च संयुगे । अभिमन्युं पिशङ्गास्तं कुमारमवहन् रणे ॥ ३३ ॥ जिसे युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनसे ड्योढ़ा बताया गया है, उस सुभद्राकुमार अभिमन्युको रणक्षेत्रमें कपिलवर्णवाले घोड़े ले गये ॥ ३३ ॥ एकस्तु धार्तराष्ट्रेभ्यः पाण्डवान् यः समाश्रितः । तं बृहन्तो महाकाया युयुत्सुमवहन् रणे ॥ ३४ ॥

पलालकाण्डवर्णास्तु वार्धक्षेमिं तरस्विनम् ।
ऊहुः सुतुमुले युद्धे हयाः कृष्णाः स्वलंकृताः ॥ ३५ ॥
आपके पुत्रोंमेंसे जो एक युयुत्सु पाण्डवोंकी शरणमें जा चुके हैं, उन्हें पुआलके डंठलके समान रंगवाले, विशालकाय एवं बृहद् अश्वोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया। उस भयंकर युद्धमें काले रंगके सजे-सजाये घोड़ोंने वृद्धक्षेमके वेगशाली पुत्रको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥

कुमारं शितिपादास्तु रुक्मचित्रैरुुरच्छदैः ।
सौचित्तिमवहन् युद्धे यन्तुः प्रेष्यकरा हयाः ॥ ३६ ॥
सुचित्तके पुत्र कुमार सत्यधृतिको सुवर्णमय विचित्र कवचोंसे सुसज्जित और काले रंगके पैरोंवाले, सारथिकी इच्छाके अनुसार चलनेवाले उत्तम घोड़ोंने युद्धक्षेत्रमें उपस्थित किया ॥ ३६ ॥

रुक्मपीठावकीर्णास्तु कौशेयसदृशा हयाः ।
सुवर्णमालिनः क्षान्ताः श्रेणिमन्तमुदावहन् ॥ ३७ ॥
सुनहरी पीठसे युक्त, रेशमके समान रोमवाले, सुवर्णमालाधारी तथा सहनशक्तिसे सम्पन्न घोड़ोंने श्रेणिमान्‌को युद्धमें पहुँचाया ॥ ३७ ॥

रुक्ममालाधराः शूरा हेमपृष्ठाः स्वलंकृताः ।
काशिराजं नरश्रेष्ठं श्लाघनीयमुदावहन् ॥ ३८ ॥
सुवर्णमाला धारण करनेवाले शूरवीर और सुवर्ण रंगके पृष्ठभागवाले सजे-सजाये घोड़े स्पृहणीय नरश्रेष्ठ काशिराजको रणभूमिमें ले गये ॥ ३८ ॥

अस्त्राणां च धनुर्वेदे बाह्ये वेदे च पारगम् ।
तं सत्यधृतिमायान्तमरुणाः समुदावहन् ॥ ३९ ॥
अस्त्रोंके ज्ञानमें, धनुर्वेदमें तथा ब्राह्मवेदमें भी पारंगत पूर्वोक्त सत्यधृतिको अरुणवर्णके अश्वोंने युद्धक्षेत्रमें उपस्थित किया ॥ ३९ ॥

यः स पाञ्चालसेनानीर्द्रोणमंशमकल्पयत् ।
पारावतसवर्णास्तं धृष्टद्युम्नमुदावहन् ॥ ४० ॥
जो पांचालोंके सेनापति हैं, जिन्होंने द्रोणाचार्यको अपना भाग निश्चित कर रखा था, उन धृष्टद्युम्नको कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥

तमन्वयात् सत्यधृतिः सौचित्तियुद्धदुर्मदः ।
श्रेणिमान् वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ॥ ४१ ॥
उनके पीछे सुचित्तके पुत्र युद्धदुर्मद सत्यधृति, श्रेणिमान्, वसुदान* और काशिराजके पुत्र अभिभू चल रहे थे ॥ ४१ ॥

युक्तैः परमकम्बोजैर्जवनैर्हेममालिभिः ।

भीषयन्तो द्विषत्सैन्यं यमवैश्रवणोपमाः ॥ ४२ ॥ ये सब-के-सब यम और कुबेरके समान पराक्रमी योद्धा वेगशाली, सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एवं सुशिक्षित, उत्तम काबुली घोड़ोंद्वारा शत्रुसेनाको भयभीत करते हुए धृष्टद्युम्नका अनुसरण कर रहे थे ॥ ४२ ॥

प्रभद्रकास्तु काम्बोजाः षट्सहस्राण्युदायुधाः । नानावर्णैर्हयैः श्रेष्ठैर्हेमवर्णरथध्वजाः ॥ ४३ ॥ शरव्रातैर्विधुन्वन्तः शत्रून् विततकार्मुकाः । समानमृत्युवो भूत्वा धृष्टद्युम्नं समन्वयुः ॥ ४४ ॥ इनके सिवा छः हजार काम्बोजदेशीय प्रभद्रक नामवाले योद्धा हथियार उठाये, भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ घोड़ोंसे जुते हुए सुनहरे रंगके रथ और ध्वजासे सम्पन्न हो धनुष फैलाये अपने बाणसमूहोंद्वारा शत्रुओंको भयसे कम्पित करते हुए सब समानरूपसे मृत्युको स्वीकार करनेके लिये उद्यत हो धृष्टद्युम्नके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥

बभ्रुकौशेयवर्णास्तु सुवर्णवरमालिनः । ऊहुरम्लानमनसश्चेकितानं हयोत्तमाः ॥ ४५ ॥ नेवले तथा रेशमके समान रंगवाले (पिंगल-गौर-वर्णके) उत्तम अश्व, जो सुन्दर सुवर्णकी मालासे विभूषित तथा प्रसन्नचित्तवाले थे, चेकितानको युद्धस्थलमें ले गये ॥ ४५ ॥

इन्द्रायुधसवर्णैस्तु कुन्तिभोजो हयोत्तमैः । आयात् सदश्वैः पुरुजिन्मातुलः सव्यसाचिनः ॥ ४६ ॥ अर्जुनके मामा पुरुजित् कुन्तिभोज इन्द्रधनुषके समान रंगवाले उत्तम श्रेणीके सुन्दर अश्वोंद्वारा उस युद्धभूमिमें आये ॥ ४६ ॥

अन्तरिक्षसवर्णास्तु तारकाचित्रिता इव । राजानं रोचमानं ते हयाः संख्ये समावहन् ॥ ४७ ॥ राजा रोचमानको ताराओंसे चित्रित अन्तरिक्षके समान चितकबरे घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ ४७ ॥

कर्बुराः शितिपादास्तु स्वर्णजालपरिच्छदाः । जारासंधिं हयाः श्रेष्ठाः सहदेवमुदावहन् ॥ ४८ ॥ जरासंधके पुत्र सहदेवको काले पैरोंवाले चितकबरे श्रेष्ठ घोड़े, जो सोनेकी जालीसे विभूषित थे, रणभूमिमें ले गये ॥ ४८ ॥

ये तु पुष्करनालस्य समवर्णा हयोत्तमाः । जवे श्येनसमाश्चित्राः सुदामानमुदावहन् ॥ ४९ ॥

कमलके नालकी भाँति श्वेतवर्णवाले और श्येन पक्षीके समान वेगशाली उत्तम एवं विचित्र अश्व सुदामाको लेकर रणक्षेत्रमें उपस्थित हुए ।। ४९ ।।
शशलोहितवर्णास्तु पाण्डुरोद्गतराजयः ।
पाञ्चाल्यं गोपतेः पुत्रं सिंहसेनमुदावहन् ।। ५० ।।
जिनके रंग खरगोशके समान और लोहित हैं तथा जिनके अंगोंमें श्वेत-पीत रोमावलियाँ सुशोभित होती हैं, वे घोड़े उन गोपतिपुत्र पांचालराजकुमार सिंहसेनको* युद्धस्थलमें ले गये थे ।। ५० ।।
पञ्चालानां नरव्याघ्रो यः ख्यातो जनमेजयः ।
तस्य सर्षपपुष्पाणां तुल्यवर्णा हयोत्तमाः ।। ५१ ।।
पांचालोंमें विख्यात जो पुरुषसिंह जनमेजय हैं, उनके उत्तम घोड़े सरसोंके फूलोंके समान पीले रंगके थे ।।
माषवर्णाश्च जवना बृहन्तो हेममालिनः ।
दधिपृष्ठाश्चित्रमुखाः पाञ्चाल्यमवहन् द्रुतम् ।। ५२ ।।
उड़दके समान रंगवाले, स्वर्णमालाविभूषित, दधिके समान श्वेत पृष्ठभागसे युक्त और चितकबरे मुखवाले वेगशाली विशाल अश्व पांचालराजकुमारको संग्रामभूमिमें शीघ्रतापूर्वक ले गये ।। ५२ ।।
शूराश्च भद्रकाश्चैव शरकाण्डनिभा हयाः ।
पद्मकिञ्जल्कवर्णाभा दण्डधारमुदावहन् ।। ५३ ।।
शूर, सुन्दर मस्तकवाले, सरकण्डेके पोरुओंके समान श्वेत-गौर तथा कमलके केसरकी भाँति कान्तिमान् घोड़े दण्डधारको रणभूमिमें ले गये ।। ५३ ।।
रासभारुणवर्णाभाः पृष्ठतो मूषिकप्रभाः ।
वल्गन्त इव संयन्ता व्याघ्रदत्तमुदावहन् ।। ५४ ।।
गदहेके समान मलिन एवं अरुणवर्णवाले, पृष्ठभागमें चूहेके समान श्याम-मलिन कान्ति धारण करनेवाले तथा विनीत घोड़े व्याघ्रदत्तको युद्धमें उछलते-कूदते हुए-से ले गये ।। ५४ ।।
हरयः कालकाश्चित्राश्चित्रमाल्यविभूषिताः ।
सुधन्वानं नरव्याघ्रं पाञ्चाल्यं समुदावहन् ।। ५५ ।।
काले मस्तकवाले, विचित्र वर्ण तथा विचित्र मालाओंसे विभूषित घोड़े पांचालदेशीय पुरुषसिंह सुधन्वाको लेकर रणभूमिमें उपस्थित हुए ।। ५५ ।।
इन्द्राशनिसमस्पर्शा इन्द्रगोपकसंनिभाः ।
काये चित्रान्तराश्चित्राश्चित्रायुधमुदावहन् ।। ५६ ।।

इन्द्रके वज्रके समान जिनका स्पर्श अत्यन्त दुःसह है, जो वीरबहूटीके समान लाल रंगवाले हैं, जिनके शरीरमें विचित्र चिह्न शोभा पाते हैं तथा जो देखनेमें भी अद्भुत हैं, वे घोड़े चित्रायुधको युद्धभूमिमें ले गये ।। बिभ्रतो हेममालास्तु चक्रवाकोदरा हयाः । कोसलाधिपतेः पुत्रं सुक्षत्रं वाजिनोऽवहन् ।। ५७ ।। सुवर्णकी माला धारण किये चक्रवाकके उदरके समान कुछ-कुछ श्वेतवर्णवाले घोड़े कोसलनरेशके पुत्र सुक्षत्रको युद्धमें ले गये ।। ५७ ।। शबलास्तु बृहन्तोऽश्वा दान्ता जाम्बूनदस्रजः । युद्धे सत्यधृतिं क्षैममवहन् प्रांशवः शुभाः ।। ५८ ।। चितकबरे, विशालकाय, वशमें किये हुए, सुवर्णकी मालासे विभूषित तथा ऊँचे कदवाले सुन्दर अश्वोंने क्षेमकुमार सत्यधृतिको युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। ५८ ।। एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । अश्वैश्च धनुषा चैव शुक्लैः शुक्लो न्यवर्तत ।। ५९ ।। जिनके ध्वज, कवच और धनुष—ये सब कुछ एक ही रंगके थे, वे राजा शुक्ल शुक्लवर्णके अश्वोंद्वारा युद्धके मैदानमें लौट आये ।। ५९ ।। समुद्रसेनपुत्रं तु सामुद्रा रुद्रतेजसम् । अश्वाः शशाङ्कसदृशाश्चन्द्रसेनमुदावहन् ।। ६० ।। समुद्रसेनके पुत्र, भयानक तेजसे युक्त चन्द्रसेनको चन्द्रमाके समान सफेद रंगवाले समुद्री घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। ६० ।। नीलोत्पलसवर्णास्तु तपनीयविभूषिताः । शैब्यं चित्ररथं संख्ये चित्रमाल्याऽवहन् हयाः ।। ६१ ।। नील-कमलके समान रंगवाले, सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित विचित्र मालाओंवाले अश्व विचित्र रथसे युक्त राजा शैब्यको युद्धस्थलमें ले गये ।। ६१ ।। कलायपुष्पवर्णास्तु श्वेतलोहितराजयः । रथसेनं हयश्रेष्ठाः समूहुर्युद्धदुर्मदम् ।। ६२ ।। जिनके रंग केरावके फूलके समान हैं, जिनकी रोमराजि श्वेतलोहित वर्णकी है, ऐसे श्रेष्ठ घोड़ोंने रणदुर्मद रथसेनको संग्रामभूमिमें पहुँचाया ।। ६२ ।। यं तु सर्वमनुष्येभ्यः प्राहुः शूरतरं नृपम् । तं पटच्चरहन्तारं शुकवर्णाऽवहन् हयाः ।। ६३ ।। जिन्हें सब मनुष्योंसे अधिक शूरवीर नरेश कहा जाता है, जो चोरों और लुटेरोंका नाश करनेवाले हैं, उन समुद्रप्रान्तके अधिपति को तोतेके समान

रंगवाले घोड़े रणभूमिमें ले गये ॥ ६३ ॥ चित्रायुधं चित्रमाल्यं चित्रवर्मायुधध्वजम् । ऊहुः किंशुकपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः ॥ ६४ ॥ जिनके माला, कवच, अस्त्र-शस्त्र और ध्वज सब कुछ विचित्र हैं, उन राजा चित्रायुधको* पलाशके फूलोंके समान लाल रंगवाले उत्तम घोड़े संग्राममें ले गये ॥ ६४ ॥ एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । धनुषा रथवाहैश्च नीलैर्नीलोऽभ्यवर्तत ॥ ६५ ॥ जिनके ध्वज, कवच और धनुष सब एक रंगके थे, वे राजा नील अपने रथमें जुते हुए नील रंगके घोड़ोंद्वारा रणक्षेत्रमें उपस्थित हुए ॥ ६५ ॥ नानारूपै रत्नचिह्नैर्वरूथैरथकार्मुकैः । वाजिध्वजपताकाभिश्चित्रैश्चित्रोऽभ्यवर्तत ॥ ६६ ॥ जिनके रथका आवरण, रथ तथा धनुष नाना प्रकारके रत्नोंसे जटिल एवं अनेक रूपवाले थे, जिनके घोड़े, ध्वजा और पताकाएँ भी विचित्र प्रकारकी थीं, वे राजा चित्र चितकबरे घोड़ोंद्वारा युद्धके मैदानमें आये ॥ ये तु पुष्करपर्णस्य तुल्यवर्णा हयोत्तमाः । ते रोचमानस्य सुतं हेमवर्णमुदावहन् ॥ ६७ ॥ जिनके रंग कमलपत्रके समान थे, वे उत्तम घोड़े रोचमानके पुत्र हेमवर्णको रणभूमिमें ले गये ॥ ६७ ॥ योधाश्च भद्रकाराश्च शरदण्डानुदण्डयः । श्वेताण्डाः कुक्कुटाण्डाभा दण्डकेतुं हयाऽवहन् ॥ ६८ ॥ युद्ध करनेमें समर्थ, कल्याणमय कार्य करनेवाले, सरकण्डेके समान श्वेत-गौर पीठवाले, श्वेत अण्डकोशधारी तथा मुर्गीके अण्डेके समान सफेद घोड़े दण्डकेतुको युद्धस्थलमें ले गये ॥ ६८ ॥ केशवेन हते संख्ये पितर्यथ नराधिपे । भिन्ने कपाटे पाण्ड्यानां विद्रुतेषु च बन्धुषु ॥ ६९ ॥ भीष्मादवाप्य बास्त्राणि द्रोणाद् रामात् कृपात् तथा । अस्त्रैः समत्वं सम्प्राप्य रुक्मिकर्णार्जुनाच्युतैः ॥ ७० ॥ इयेष द्वारकां हन्तुं कृत्स्नां जेतुं च मेदिनीम् । निवारितस्ततः प्राज्ञैः सुहृद्भिर्हितकाम्यया ॥ ७१ ॥ वैरानुबन्धमुत्सृज्य स्वराज्यमनुशास्ति यः । स सागरध्वजः पाण्ड्यश्चन्द्रश्वरश्मिनिभैर्हयैः ॥ ७२ ॥ वैडूर्यजालसंछन्नैर्वीर्यद्रविणमाश्रितः ।

दिव्यं विस्फारयंश्चापं द्रोणमभ्यद्रवद् बली ॥ ७३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे जब युद्धमें पाण्ड्यदेशके राजा तथा वर्तमान नरेशके पिता मारे गये, पाण्ड्यराजधानीका फाटक तोड़-फोड़ दिया गया और सारे बन्धु-बान्धव भाग गये, उस समय जिसने भीष्म, द्रोण, परशुराम तथा कृपाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखकर उसमें रुक्मी, कर्ण, अर्जुन और श्रीकृष्णकी समानता प्राप्त कर ली; फिर द्वारकाको नष्ट करने और सारी पृथ्वीपर विजय पानेका संकल्प किया; यह देख विद्वान् सुहृदोंने हितकी कामना रखकर जिसे वैसा दुःसाहस करनेसे रोक दिया और अब जो वैरभाव छोड़कर अपने राज्यका शासन कर रहा है और जिसके रथपर सागरके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती है, पराक्रमरूपी धनका आश्रय लेनेवाले उस बलवान् राजा पाण्ड्यने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करते हुए वैदूर्यमणिकी जालीसे आच्छादित तथा चन्द्रकिरणोंके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ६९—७३ ॥
आटरूषकवर्णाभा हयाः पाण्ड्यानुयायिनाम् ।
अवहन् रथमुख्यानामयुतानि चतुर्दश ॥ ७४ ॥
वासक-पुष्पोंके समान रंगवाले घोड़े राजा पाण्ड्यके पीछे चलनेवाले एक लाख चालीस हजार श्रेष्ठ रथोंका भार वहन कर रहे थे ॥ ७४ ॥
नानावर्णेन रूपेण नानाकृतिमुखा हयाः ।
रथचक्रध्वजं वीरं घटोत्कचमुदावहन् ॥ ७५ ॥
अनेक प्रकारके रंग-रूपसे युक्त विभिन्न आकृति और मुखवाले घोड़े रथके पहियेके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले वीर घटोत्कचको रणभूमिमें ले गये ॥ ७५ ॥
भारतानां समेतानामुत्सृज्यैको मतानि यः ।
गतो युधिष्ठिरं भक्त्या त्यक्त्वा सर्वमभीप्सितम् ॥ ७६ ॥
लोहिताक्षं महाबाहुं बृहन्तं तमरट्टजाः ।
महासत्त्वा महाकायाः सौवर्णस्यन्दने स्थितम् ॥ ७७ ॥
जो एकत्र हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंके मतोंका परित्याग करके अपने सम्पूर्ण मनोरथोंको छोड़कर केवल भक्तिभावसे युधिष्ठिरके पक्षमें चले गये, उन लाल नेत्र और विशाल भुजावाले राजा बृहन्तको, जो सुवर्णमय रथपर बैठे हुए थे, अरट्टदेशके महापराक्रमी, विशालकाय और सुनहरे रंगवाले घोड़े रणभूमिमें ले गये ॥ ७६-७७ ॥
सुवर्णवर्णा धर्मज्ञमनीकस्थं युधिष्ठिरम् ।
राजश्रेष्ठं हयश्रेष्ठाः सर्वतः पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ७८ ॥
धर्मके ज्ञाता तथा सेनाके मध्यभागमें विद्यमान नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर सुवर्णके समान रंगवाले श्रेष्ठ घोड़े उनके साथ-साथ चल रहे