महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 205, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिव्यं विस्फारयंश्चापं द्रोणमभ्यद्रवद् बली ॥ ७३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे जब युद्धमें पाण्ड्यदेशके राजा तथा वर्तमान नरेशके पिता मारे गये, पाण्ड्यराजधानीका फाटक तोड़-फोड़ दिया गया और सारे बन्धु-बान्धव भाग गये, उस समय जिसने भीष्म, द्रोण, परशुराम तथा कृपाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखकर उसमें रुक्मी, कर्ण, अर्जुन और श्रीकृष्णकी समानता प्राप्त कर ली; फिर द्वारकाको नष्ट करने और सारी पृथ्वीपर विजय पानेका संकल्प किया; यह देख विद्वान् सुहृदोंने हितकी कामना रखकर जिसे वैसा दुःसाहस करनेसे रोक दिया और अब जो वैरभाव छोड़कर अपने राज्यका शासन कर रहा है और जिसके रथपर सागरके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती है, पराक्रमरूपी धनका आश्रय लेनेवाले उस बलवान् राजा पाण्ड्यने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करते हुए वैदूर्यमणिकी जालीसे आच्छादित तथा चन्द्रकिरणोंके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ६९—७३ ॥
आटरूषकवर्णाभा हयाः पाण्ड्यानुयायिनाम् ।
अवहन् रथमुख्यानामयुतानि चतुर्दश ॥ ७४ ॥
वासक-पुष्पोंके समान रंगवाले घोड़े राजा पाण्ड्यके पीछे चलनेवाले एक लाख चालीस हजार श्रेष्ठ रथोंका भार वहन कर रहे थे ॥ ७४ ॥
नानावर्णेन रूपेण नानाकृतिमुखा हयाः ।
रथचक्रध्वजं वीरं घटोत्कचमुदावहन् ॥ ७५ ॥
अनेक प्रकारके रंग-रूपसे युक्त विभिन्न आकृति और मुखवाले घोड़े रथके पहियेके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले वीर घटोत्कचको रणभूमिमें ले गये ॥ ७५ ॥
भारतानां समेतानामुत्सृज्यैको मतानि यः ।
गतो युधिष्ठिरं भक्त्या त्यक्त्वा सर्वमभीप्सितम् ॥ ७६ ॥
लोहिताक्षं महाबाहुं बृहन्तं तमरट्टजाः ।
महासत्त्वा महाकायाः सौवर्णस्यन्दने स्थितम् ॥ ७७ ॥
जो एकत्र हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंके मतोंका परित्याग करके अपने सम्पूर्ण मनोरथोंको छोड़कर केवल भक्तिभावसे युधिष्ठिरके पक्षमें चले गये, उन लाल नेत्र और विशाल भुजावाले राजा बृहन्तको, जो सुवर्णमय रथपर बैठे हुए थे, अरट्टदेशके महापराक्रमी, विशालकाय और सुनहरे रंगवाले घोड़े रणभूमिमें ले गये ॥ ७६-७७ ॥
सुवर्णवर्णा धर्मज्ञमनीकस्थं युधिष्ठिरम् ।
राजश्रेष्ठं हयश्रेष्ठाः सर्वतः पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ७८ ॥
धर्मके ज्ञाता तथा सेनाके मध्यभागमें विद्यमान नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर सुवर्णके समान रंगवाले श्रेष्ठ घोड़े उनके साथ-साथ चल रहे