भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 206

थे ।। ७८ ।। वर्णैरुच्चावचैरन्यैः सदश्वानां प्रभद्रकाः । संन्यवर्तन्त युद्धाय बहवो देवरूपिणः ।। ७९ ।। अन्य भिन्न-भिन्न प्रकारके वर्णोंसे युक्त सुन्दर अश्वोंका आश्रय ले प्रभद्रक नामवाले देवताओं-जैसे रूपवान् बहुसंख्यक प्रभद्रकगण युद्धके लिये लौट पड़े ।। ७९ ।।

ते यत्ता भीमसेनेन सहिताः काञ्चनध्वजाः । प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र सेन्द्रा इव दिवौकसः ।। ८० ।। राजेन्द्र! भीमसेनसहित पूरी सावधानीसे युद्धके लिये उद्यत हुए ये सुवर्णमय ध्वजवाले राजालोग इन्द्रसहित देवताओंके समान दृष्टिगोचर होते थे ।। ८० ।।

अत्यरोचत तान् सर्वान् धृष्टद्युम्नः समागतान् । सर्वाण्यति च सैन्यानि भारद्वाजो व्यरोचत ।। ८१ ।। वहाँ एकत्र हुए उन सब राजाओंकी अपेक्षा धृष्टद्युम्नकी अधिक शोभा हो रही थी और समस्त सेनाओंसे ऊपर उठकर भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य सुशोभित हो रहे थे ।। ८१ ।।

अतीव शुशुभे तस्य ध्वजः कृष्णाजिनोत्तरः । कमण्डलुर्महाराज जातरूपमयः शुभः ।। ८२ ।। महाराज! काले मृगचर्म और कमण्डलुके चिह्नसे युक्त उनका सुवर्णमय सुन्दर ध्वज अत्यन्त शोभा पा रहा था ।। ८२ ।।

ध्वजं तु भीमसेनस्य वैदूर्यमणिलोचनम् । भ्राजमानं महासिंहं राजन्तं दृष्टवानहम् ।। ८३ ।। वैदूर्यमणिमय नेत्रोंसे सुशोभित महासिंहके चिह्नसे युक्त भीमसेनकी चमकीली ध्वजा फहराती हुई बड़ी शोभा पा रही थी। उसे मैंने देखा था ।। ८३ ।।

ध्वजं तु कुरुराजस्य पाण्डवस्य महौजसः । दृष्टवानस्मि सौवर्णं सोमं ग्रहगणान्वितम् ।। ८४ ।। महातेजस्वी कुरुराज पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सुवर्णमयी ध्वजाको मैंने चन्द्रमा तथा ग्रहगणोंके चिह्नसे सुशोभित देखा है ।। ८४ ।।

मृदङ्गौ चात्र विपुलौ दिव्यौ नन्दोपनन्दकौ । यन्त्रेणाहन्यमानौ च सुस्वनौ हर्षवर्धनौ ।। ८५ ।। इस ध्वजामें नन्द-उपनन्द नामक दो विशाल एवं दिव्य मृदंग लगे हुए हैं। वे यन्त्रके द्वारा बिना बजाये बजते हैं और सुन्दर शब्दका विस्तार करके सबका हर्ष बढ़ाते हैं ।। ८५ ।।