भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

शरभं पृष्ठसौवर्णं नकुलस्य महाध्वजम् । अपश्याम रथेऽत्युग्रं भीषयाणमवस्थितम् ॥ ८६ ॥ नकुलकी विशाल ध्वजा शरभके चिह्नसे युक्त तथा पृष्ठभागमें सुवर्णमयी है। हमने देखा, वह अत्यन्त भयंकर रूपसे उनके रथपर फहराती और सबको भयभीत करती थी ॥ ८६ ॥

हंसस्तु राजतः श्रीमान् ध्वजे घण्टापताकवान् । सहदेवस्य दुर्धर्षो द्विषतां शोकवर्धनः ॥ ८७ ॥ सहदेवकी ध्वजामें घंटा और पताकाके साथ चाँदीके बने सुन्दर हंसका चिह्न था। वह दुर्धर्ष ध्वज शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाला था ॥ ८७ ॥

पञ्चानां द्रौपदेयानां प्रतिमा ध्वजभूषणम् । धर्ममारुतशक्राणामश्विनोश्च महात्मनोः ॥ ८८ ॥ क्रमशः धर्म, वायु, इन्द्र तथा महात्मा अश्विनीकुमारोंकी प्रतिमाएँ पाँचों द्रौपदीपुत्रोंके ध्वजोंकी शोभा बढ़ाती थीं ॥

अभिमन्योः कुमारस्य शार्ङ्गपक्षी हिरण्मयः । रथे ध्वजवरो राजंस्तप्तचामीकरोज्ज्वलः ॥ ८९ ॥ राजन्! कुमार अभिमन्युके रथका श्रेष्ठ ध्वज तपाये हुए सुवर्णसे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान था। उसमें सुवर्णमय शार्ङ्गपक्षीका चिह्न था ॥

घटोत्कचस्य राजेन्द्र ध्वजे गृध्रो व्यरोचत । अश्वाश्च कामगास्तस्य रावणस्य पुरा यथा ॥ ९० ॥ राजेन्द्र! राक्षस घटोत्कचकी ध्वजामें गीध शोभा पाता था। पूर्वकालमें रावणके रथकी भाँति उसके रथमें भी इच्छानुसार चलनेवाले घोड़े जुते हुए थे ॥ ९० ॥

माहेन्द्रं च धनुर्दिव्यं धर्मराजे युधिष्ठिरे । वायव्यं भीमसेनस्य धनुर्दिव्यमभून्नृप ॥ ९१ ॥ राजन्! धर्मराज युधिष्ठिरके पास महेन्द्रका दिया हुआ दिव्य धनुष शोभा पाता था। इसी प्रकार भीमसेनके पास वायु देवताका दिया हुआ दिव्य धनुष था ॥ ९१ ॥

त्रैलोक्यरक्षणार्थाय ब्रह्मणा सृष्टमायुधम् । तद् दिव्यमजरं चैव फाल्गुनार्थाय वै धनुः ॥ ९२ ॥ तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने जिस आयुधकी सृष्टि की थी, वह कभी जीर्ण न होनेवाला दिव्य गाण्डीव धनुष अर्जुनको प्राप्त हुआ था ॥ ९२ ॥

वैष्णवं नकुलायाथ सहदेवाय चाश्विजम् ।