भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 187

सर्वतोऽभ्यद्रवन् द्रोणं कुन्तीपुत्रपुरोगमाः ॥ ४६ ॥
समस्त सेनाओंको दग्ध करनेवाले यमराजके समान भयंकर उदार महारथी द्रोणाचार्यपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर आदि सब वीर सब ओरसे टूट पड़े ॥ ४६ ॥
ते द्रोणं सहिताः शूराः सर्वतः प्रत्यवारयन् ।
गभस्तिभिरिवादित्यं तपन्तं भुवनं यथा ॥ ४७ ॥
उन सभी शूरवीरोंने एक साथ आकर द्रोणाचार्यको सब ओरसे उसी प्रकार घेर लिया, जैसे जगत्‌को तपानेवाले भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे घिरे रहते हैं ॥ ४७ ॥
तं तु शूरं महेष्वासं तावकाऽभ्युद्यतायुधाः ।
राजानो राजपुत्राश्च समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ४८ ॥
आपकी सेनाके राजा और राजकुमारोंने अस्त्र-शस्त्र लेकर उन शौर्यसम्पन्न महाधनुर्धर द्रोणाचार्यको उनकी रक्षाके लिये सब ओरसे घेर रखा था ॥ ४८ ॥
शिखण्डी तु ततो द्रोणं पञ्चभिर्नतपर्वभिः ।
क्षत्रवर्मा च विंशत्या वसुदानश्च पञ्चभिः ॥ ४९ ॥
उत्तमौजास्त्रिभिर्बाणैः क्षत्रदेवश्च सप्तभिः ।
सात्यकिश्च शतेनाजौ युधामन्युस्तथाष्टभिः ॥ ५० ॥
युधिष्ठिरो द्वादशभिर्द्रोणं विव्याध सायकैः ।
धृष्टद्युम्नश्च दशभिश्चेकितानस्त्रिभिः शरैः ॥ ५१ ॥
उस समय शिखण्डीने झुकी हुई गाँठवाले पाँच बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको बींध डाला। तत्पश्चात् क्षत्रवर्माने बीस, वसुदानने पाँच, उत्तमौजाने तीन, क्षत्रदेवने सात, सात्यकिने सौ, युधामन्युने आठ और युधिष्ठिरने बारह बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। धृष्टद्युम्नने दस और चेकितानने उन्हें तीन बाण मारे ॥ ४९—५१ ॥
ततो द्रोणः सत्यसंधः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ।
अभ्यतीत्य रथानीकं दृढसेनमपातयत् ॥ ५२ ॥
तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ द्रोणने मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति रथ-सेनाको लाँघकर दृढसेनको मार गिराया ॥ ५२ ॥
ततो राजानमासाद्य प्रहरन्तमभीतवत् ।
अविध्यन्नवभिः क्षेमं स हतः प्रापतद् रथात् ॥ ५३ ॥
फिर निर्भय-से प्रहार करते हुए राजा क्षेमके पास पहुँचकर उन्हें नौ बाणोंसे बींध डाला। उन बाणोंसे मारे जाकर वे रथसे नीचे गिर गये ॥ ५३ ॥
स मध्यं प्राप्य सैन्यानां सर्वाः प्रविचरन् दिशः ।
त्राता ह्यभवदन्येषां न त्रातव्यः कथञ्चन ॥ ५४ ॥
यद्यपि वे शत्रुसेनाके भीतर घुसकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचर रहे थे, तथापि वे ही दूसरोंके रक्षक थे, स्वयं किसी प्रकार किसीके रक्षणीय नहीं हुए ॥ ५४ ॥