भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 201

भीषयन्तो द्विषत्सैन्यं यमवैश्रवणोपमाः ॥ ४२ ॥ ये सब-के-सब यम और कुबेरके समान पराक्रमी योद्धा वेगशाली, सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एवं सुशिक्षित, उत्तम काबुली घोड़ोंद्वारा शत्रुसेनाको भयभीत करते हुए धृष्टद्युम्नका अनुसरण कर रहे थे ॥ ४२ ॥

प्रभद्रकास्तु काम्बोजाः षट्सहस्राण्युदायुधाः । नानावर्णैर्हयैः श्रेष्ठैर्हेमवर्णरथध्वजाः ॥ ४३ ॥ शरव्रातैर्विधुन्वन्तः शत्रून् विततकार्मुकाः । समानमृत्युवो भूत्वा धृष्टद्युम्नं समन्वयुः ॥ ४४ ॥ इनके सिवा छः हजार काम्बोजदेशीय प्रभद्रक नामवाले योद्धा हथियार उठाये, भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ घोड़ोंसे जुते हुए सुनहरे रंगके रथ और ध्वजासे सम्पन्न हो धनुष फैलाये अपने बाणसमूहोंद्वारा शत्रुओंको भयसे कम्पित करते हुए सब समानरूपसे मृत्युको स्वीकार करनेके लिये उद्यत हो धृष्टद्युम्नके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥

बभ्रुकौशेयवर्णास्तु सुवर्णवरमालिनः । ऊहुरम्लानमनसश्चेकितानं हयोत्तमाः ॥ ४५ ॥ नेवले तथा रेशमके समान रंगवाले (पिंगल-गौर-वर्णके) उत्तम अश्व, जो सुन्दर सुवर्णकी मालासे विभूषित तथा प्रसन्नचित्तवाले थे, चेकितानको युद्धस्थलमें ले गये ॥ ४५ ॥

इन्द्रायुधसवर्णैस्तु कुन्तिभोजो हयोत्तमैः । आयात् सदश्वैः पुरुजिन्मातुलः सव्यसाचिनः ॥ ४६ ॥ अर्जुनके मामा पुरुजित् कुन्तिभोज इन्द्रधनुषके समान रंगवाले उत्तम श्रेणीके सुन्दर अश्वोंद्वारा उस युद्धभूमिमें आये ॥ ४६ ॥

अन्तरिक्षसवर्णास्तु तारकाचित्रिता इव । राजानं रोचमानं ते हयाः संख्ये समावहन् ॥ ४७ ॥ राजा रोचमानको ताराओंसे चित्रित अन्तरिक्षके समान चितकबरे घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ ४७ ॥

कर्बुराः शितिपादास्तु स्वर्णजालपरिच्छदाः । जारासंधिं हयाः श्रेष्ठाः सहदेवमुदावहन् ॥ ४८ ॥ जरासंधके पुत्र सहदेवको काले पैरोंवाले चितकबरे श्रेष्ठ घोड़े, जो सोनेकी जालीसे विभूषित थे, रणभूमिमें ले गये ॥ ४८ ॥

ये तु पुष्करनालस्य समवर्णा हयोत्तमाः । जवे श्येनसमाश्चित्राः सुदामानमुदावहन् ॥ ४९ ॥