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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

भीषयन्तो द्विषत्सैन्यं यमवैश्रवणोपमाः ॥ ४२ ॥ ये सब-के-सब यम और कुबेरके समान पराक्रमी योद्धा वेगशाली, सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एवं सुशिक्षित, उत्तम काबुली घोड़ोंद्वारा शत्रुसेनाको भयभीत करते हुए धृष्टद्युम्नका अनुसरण कर रहे थे ॥ ४२ ॥

प्रभद्रकास्तु काम्बोजाः षट्सहस्राण्युदायुधाः । नानावर्णैर्हयैः श्रेष्ठैर्हेमवर्णरथध्वजाः ॥ ४३ ॥ शरव्रातैर्विधुन्वन्तः शत्रून् विततकार्मुकाः । समानमृत्युवो भूत्वा धृष्टद्युम्नं समन्वयुः ॥ ४४ ॥ इनके सिवा छः हजार काम्बोजदेशीय प्रभद्रक नामवाले योद्धा हथियार उठाये, भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ घोड़ोंसे जुते हुए सुनहरे रंगके रथ और ध्वजासे सम्पन्न हो धनुष फैलाये अपने बाणसमूहोंद्वारा शत्रुओंको भयसे कम्पित करते हुए सब समानरूपसे मृत्युको स्वीकार करनेके लिये उद्यत हो धृष्टद्युम्नके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥

बभ्रुकौशेयवर्णास्तु सुवर्णवरमालिनः । ऊहुरम्लानमनसश्चेकितानं हयोत्तमाः ॥ ४५ ॥ नेवले तथा रेशमके समान रंगवाले (पिंगल-गौर-वर्णके) उत्तम अश्व, जो सुन्दर सुवर्णकी मालासे विभूषित तथा प्रसन्नचित्तवाले थे, चेकितानको युद्धस्थलमें ले गये ॥ ४५ ॥

इन्द्रायुधसवर्णैस्तु कुन्तिभोजो हयोत्तमैः । आयात् सदश्वैः पुरुजिन्मातुलः सव्यसाचिनः ॥ ४६ ॥ अर्जुनके मामा पुरुजित् कुन्तिभोज इन्द्रधनुषके समान रंगवाले उत्तम श्रेणीके सुन्दर अश्वोंद्वारा उस युद्धभूमिमें आये ॥ ४६ ॥

अन्तरिक्षसवर्णास्तु तारकाचित्रिता इव । राजानं रोचमानं ते हयाः संख्ये समावहन् ॥ ४७ ॥ राजा रोचमानको ताराओंसे चित्रित अन्तरिक्षके समान चितकबरे घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ ४७ ॥

कर्बुराः शितिपादास्तु स्वर्णजालपरिच्छदाः । जारासंधिं हयाः श्रेष्ठाः सहदेवमुदावहन् ॥ ४८ ॥ जरासंधके पुत्र सहदेवको काले पैरोंवाले चितकबरे श्रेष्ठ घोड़े, जो सोनेकी जालीसे विभूषित थे, रणभूमिमें ले गये ॥ ४८ ॥

ये तु पुष्करनालस्य समवर्णा हयोत्तमाः । जवे श्येनसमाश्चित्राः सुदामानमुदावहन् ॥ ४९ ॥

कमलके नालकी भाँति श्वेतवर्णवाले और श्येन पक्षीके समान वेगशाली उत्तम एवं विचित्र अश्व सुदामाको लेकर रणक्षेत्रमें उपस्थित हुए ।। ४९ ।।
शशलोहितवर्णास्तु पाण्डुरोद्गतराजयः ।
पाञ्चाल्यं गोपतेः पुत्रं सिंहसेनमुदावहन् ।। ५० ।।
जिनके रंग खरगोशके समान और लोहित हैं तथा जिनके अंगोंमें श्वेत-पीत रोमावलियाँ सुशोभित होती हैं, वे घोड़े उन गोपतिपुत्र पांचालराजकुमार सिंहसेनको* युद्धस्थलमें ले गये थे ।। ५० ।।
पञ्चालानां नरव्याघ्रो यः ख्यातो जनमेजयः ।
तस्य सर्षपपुष्पाणां तुल्यवर्णा हयोत्तमाः ।। ५१ ।।
पांचालोंमें विख्यात जो पुरुषसिंह जनमेजय हैं, उनके उत्तम घोड़े सरसोंके फूलोंके समान पीले रंगके थे ।।
माषवर्णाश्च जवना बृहन्तो हेममालिनः ।
दधिपृष्ठाश्चित्रमुखाः पाञ्चाल्यमवहन् द्रुतम् ।। ५२ ।।
उड़दके समान रंगवाले, स्वर्णमालाविभूषित, दधिके समान श्वेत पृष्ठभागसे युक्त और चितकबरे मुखवाले वेगशाली विशाल अश्व पांचालराजकुमारको संग्रामभूमिमें शीघ्रतापूर्वक ले गये ।। ५२ ।।
शूराश्च भद्रकाश्चैव शरकाण्डनिभा हयाः ।
पद्मकिञ्जल्कवर्णाभा दण्डधारमुदावहन् ।। ५३ ।।
शूर, सुन्दर मस्तकवाले, सरकण्डेके पोरुओंके समान श्वेत-गौर तथा कमलके केसरकी भाँति कान्तिमान् घोड़े दण्डधारको रणभूमिमें ले गये ।। ५३ ।।
रासभारुणवर्णाभाः पृष्ठतो मूषिकप्रभाः ।
वल्गन्त इव संयन्ता व्याघ्रदत्तमुदावहन् ।। ५४ ।।
गदहेके समान मलिन एवं अरुणवर्णवाले, पृष्ठभागमें चूहेके समान श्याम-मलिन कान्ति धारण करनेवाले तथा विनीत घोड़े व्याघ्रदत्तको युद्धमें उछलते-कूदते हुए-से ले गये ।। ५४ ।।
हरयः कालकाश्चित्राश्चित्रमाल्यविभूषिताः ।
सुधन्वानं नरव्याघ्रं पाञ्चाल्यं समुदावहन् ।। ५५ ।।
काले मस्तकवाले, विचित्र वर्ण तथा विचित्र मालाओंसे विभूषित घोड़े पांचालदेशीय पुरुषसिंह सुधन्वाको लेकर रणभूमिमें उपस्थित हुए ।। ५५ ।।
इन्द्राशनिसमस्पर्शा इन्द्रगोपकसंनिभाः ।
काये चित्रान्तराश्चित्राश्चित्रायुधमुदावहन् ।। ५६ ।।

इन्द्रके वज्रके समान जिनका स्पर्श अत्यन्त दुःसह है, जो वीरबहूटीके समान लाल रंगवाले हैं, जिनके शरीरमें विचित्र चिह्न शोभा पाते हैं तथा जो देखनेमें भी अद्भुत हैं, वे घोड़े चित्रायुधको युद्धभूमिमें ले गये ।। बिभ्रतो हेममालास्तु चक्रवाकोदरा हयाः । कोसलाधिपतेः पुत्रं सुक्षत्रं वाजिनोऽवहन् ।। ५७ ।। सुवर्णकी माला धारण किये चक्रवाकके उदरके समान कुछ-कुछ श्वेतवर्णवाले घोड़े कोसलनरेशके पुत्र सुक्षत्रको युद्धमें ले गये ।। ५७ ।। शबलास्तु बृहन्तोऽश्वा दान्ता जाम्बूनदस्रजः । युद्धे सत्यधृतिं क्षैममवहन् प्रांशवः शुभाः ।। ५८ ।। चितकबरे, विशालकाय, वशमें किये हुए, सुवर्णकी मालासे विभूषित तथा ऊँचे कदवाले सुन्दर अश्वोंने क्षेमकुमार सत्यधृतिको युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। ५८ ।। एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । अश्वैश्च धनुषा चैव शुक्लैः शुक्लो न्यवर्तत ।। ५९ ।। जिनके ध्वज, कवच और धनुष—ये सब कुछ एक ही रंगके थे, वे राजा शुक्ल शुक्लवर्णके अश्वोंद्वारा युद्धके मैदानमें लौट आये ।। ५९ ।। समुद्रसेनपुत्रं तु सामुद्रा रुद्रतेजसम् । अश्वाः शशाङ्कसदृशाश्चन्द्रसेनमुदावहन् ।। ६० ।। समुद्रसेनके पुत्र, भयानक तेजसे युक्त चन्द्रसेनको चन्द्रमाके समान सफेद रंगवाले समुद्री घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। ६० ।। नीलोत्पलसवर्णास्तु तपनीयविभूषिताः । शैब्यं चित्ररथं संख्ये चित्रमाल्याऽवहन् हयाः ।। ६१ ।। नील-कमलके समान रंगवाले, सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित विचित्र मालाओंवाले अश्व विचित्र रथसे युक्त राजा शैब्यको युद्धस्थलमें ले गये ।। ६१ ।। कलायपुष्पवर्णास्तु श्वेतलोहितराजयः । रथसेनं हयश्रेष्ठाः समूहुर्युद्धदुर्मदम् ।। ६२ ।। जिनके रंग केरावके फूलके समान हैं, जिनकी रोमराजि श्वेतलोहित वर्णकी है, ऐसे श्रेष्ठ घोड़ोंने रणदुर्मद रथसेनको संग्रामभूमिमें पहुँचाया ।। ६२ ।। यं तु सर्वमनुष्येभ्यः प्राहुः शूरतरं नृपम् । तं पटच्चरहन्तारं शुकवर्णाऽवहन् हयाः ।। ६३ ।। जिन्हें सब मनुष्योंसे अधिक शूरवीर नरेश कहा जाता है, जो चोरों और लुटेरोंका नाश करनेवाले हैं, उन समुद्रप्रान्तके अधिपति को तोतेके समान

रंगवाले घोड़े रणभूमिमें ले गये ॥ ६३ ॥ चित्रायुधं चित्रमाल्यं चित्रवर्मायुधध्वजम् । ऊहुः किंशुकपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः ॥ ६४ ॥ जिनके माला, कवच, अस्त्र-शस्त्र और ध्वज सब कुछ विचित्र हैं, उन राजा चित्रायुधको* पलाशके फूलोंके समान लाल रंगवाले उत्तम घोड़े संग्राममें ले गये ॥ ६४ ॥ एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च । धनुषा रथवाहैश्च नीलैर्नीलोऽभ्यवर्तत ॥ ६५ ॥ जिनके ध्वज, कवच और धनुष सब एक रंगके थे, वे राजा नील अपने रथमें जुते हुए नील रंगके घोड़ोंद्वारा रणक्षेत्रमें उपस्थित हुए ॥ ६५ ॥ नानारूपै रत्नचिह्नैर्वरूथैरथकार्मुकैः । वाजिध्वजपताकाभिश्चित्रैश्चित्रोऽभ्यवर्तत ॥ ६६ ॥ जिनके रथका आवरण, रथ तथा धनुष नाना प्रकारके रत्नोंसे जटिल एवं अनेक रूपवाले थे, जिनके घोड़े, ध्वजा और पताकाएँ भी विचित्र प्रकारकी थीं, वे राजा चित्र चितकबरे घोड़ोंद्वारा युद्धके मैदानमें आये ॥ ये तु पुष्करपर्णस्य तुल्यवर्णा हयोत्तमाः । ते रोचमानस्य सुतं हेमवर्णमुदावहन् ॥ ६७ ॥ जिनके रंग कमलपत्रके समान थे, वे उत्तम घोड़े रोचमानके पुत्र हेमवर्णको रणभूमिमें ले गये ॥ ६७ ॥ योधाश्च भद्रकाराश्च शरदण्डानुदण्डयः । श्वेताण्डाः कुक्कुटाण्डाभा दण्डकेतुं हयाऽवहन् ॥ ६८ ॥ युद्ध करनेमें समर्थ, कल्याणमय कार्य करनेवाले, सरकण्डेके समान श्वेत-गौर पीठवाले, श्वेत अण्डकोशधारी तथा मुर्गीके अण्डेके समान सफेद घोड़े दण्डकेतुको युद्धस्थलमें ले गये ॥ ६८ ॥ केशवेन हते संख्ये पितर्यथ नराधिपे । भिन्ने कपाटे पाण्ड्यानां विद्रुतेषु च बन्धुषु ॥ ६९ ॥ भीष्मादवाप्य बास्त्राणि द्रोणाद् रामात् कृपात् तथा । अस्त्रैः समत्वं सम्प्राप्य रुक्मिकर्णार्जुनाच्युतैः ॥ ७० ॥ इयेष द्वारकां हन्तुं कृत्स्नां जेतुं च मेदिनीम् । निवारितस्ततः प्राज्ञैः सुहृद्भिर्हितकाम्यया ॥ ७१ ॥ वैरानुबन्धमुत्सृज्य स्वराज्यमनुशास्ति यः । स सागरध्वजः पाण्ड्यश्चन्द्रश्वरश्मिनिभैर्हयैः ॥ ७२ ॥ वैडूर्यजालसंछन्नैर्वीर्यद्रविणमाश्रितः ।

दिव्यं विस्फारयंश्चापं द्रोणमभ्यद्रवद् बली ॥ ७३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे जब युद्धमें पाण्ड्यदेशके राजा तथा वर्तमान नरेशके पिता मारे गये, पाण्ड्यराजधानीका फाटक तोड़-फोड़ दिया गया और सारे बन्धु-बान्धव भाग गये, उस समय जिसने भीष्म, द्रोण, परशुराम तथा कृपाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखकर उसमें रुक्मी, कर्ण, अर्जुन और श्रीकृष्णकी समानता प्राप्त कर ली; फिर द्वारकाको नष्ट करने और सारी पृथ्वीपर विजय पानेका संकल्प किया; यह देख विद्वान् सुहृदोंने हितकी कामना रखकर जिसे वैसा दुःसाहस करनेसे रोक दिया और अब जो वैरभाव छोड़कर अपने राज्यका शासन कर रहा है और जिसके रथपर सागरके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती है, पराक्रमरूपी धनका आश्रय लेनेवाले उस बलवान् राजा पाण्ड्यने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करते हुए वैदूर्यमणिकी जालीसे आच्छादित तथा चन्द्रकिरणोंके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ६९—७३ ॥
आटरूषकवर्णाभा हयाः पाण्ड्यानुयायिनाम् ।
अवहन् रथमुख्यानामयुतानि चतुर्दश ॥ ७४ ॥
वासक-पुष्पोंके समान रंगवाले घोड़े राजा पाण्ड्यके पीछे चलनेवाले एक लाख चालीस हजार श्रेष्ठ रथोंका भार वहन कर रहे थे ॥ ७४ ॥
नानावर्णेन रूपेण नानाकृतिमुखा हयाः ।
रथचक्रध्वजं वीरं घटोत्कचमुदावहन् ॥ ७५ ॥
अनेक प्रकारके रंग-रूपसे युक्त विभिन्न आकृति और मुखवाले घोड़े रथके पहियेके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले वीर घटोत्कचको रणभूमिमें ले गये ॥ ७५ ॥
भारतानां समेतानामुत्सृज्यैको मतानि यः ।
गतो युधिष्ठिरं भक्त्या त्यक्त्वा सर्वमभीप्सितम् ॥ ७६ ॥
लोहिताक्षं महाबाहुं बृहन्तं तमरट्टजाः ।
महासत्त्वा महाकायाः सौवर्णस्यन्दने स्थितम् ॥ ७७ ॥
जो एकत्र हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंके मतोंका परित्याग करके अपने सम्पूर्ण मनोरथोंको छोड़कर केवल भक्तिभावसे युधिष्ठिरके पक्षमें चले गये, उन लाल नेत्र और विशाल भुजावाले राजा बृहन्तको, जो सुवर्णमय रथपर बैठे हुए थे, अरट्टदेशके महापराक्रमी, विशालकाय और सुनहरे रंगवाले घोड़े रणभूमिमें ले गये ॥ ७६-७७ ॥
सुवर्णवर्णा धर्मज्ञमनीकस्थं युधिष्ठिरम् ।
राजश्रेष्ठं हयश्रेष्ठाः सर्वतः पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ७८ ॥
धर्मके ज्ञाता तथा सेनाके मध्यभागमें विद्यमान नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर सुवर्णके समान रंगवाले श्रेष्ठ घोड़े उनके साथ-साथ चल रहे

थे ।। ७८ ।। वर्णैरुच्चावचैरन्यैः सदश्वानां प्रभद्रकाः । संन्यवर्तन्त युद्धाय बहवो देवरूपिणः ।। ७९ ।। अन्य भिन्न-भिन्न प्रकारके वर्णोंसे युक्त सुन्दर अश्वोंका आश्रय ले प्रभद्रक नामवाले देवताओं-जैसे रूपवान् बहुसंख्यक प्रभद्रकगण युद्धके लिये लौट पड़े ।। ७९ ।।

ते यत्ता भीमसेनेन सहिताः काञ्चनध्वजाः । प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र सेन्द्रा इव दिवौकसः ।। ८० ।। राजेन्द्र! भीमसेनसहित पूरी सावधानीसे युद्धके लिये उद्यत हुए ये सुवर्णमय ध्वजवाले राजालोग इन्द्रसहित देवताओंके समान दृष्टिगोचर होते थे ।। ८० ।।

अत्यरोचत तान् सर्वान् धृष्टद्युम्नः समागतान् । सर्वाण्यति च सैन्यानि भारद्वाजो व्यरोचत ।। ८१ ।। वहाँ एकत्र हुए उन सब राजाओंकी अपेक्षा धृष्टद्युम्नकी अधिक शोभा हो रही थी और समस्त सेनाओंसे ऊपर उठकर भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य सुशोभित हो रहे थे ।। ८१ ।।

अतीव शुशुभे तस्य ध्वजः कृष्णाजिनोत्तरः । कमण्डलुर्महाराज जातरूपमयः शुभः ।। ८२ ।। महाराज! काले मृगचर्म और कमण्डलुके चिह्नसे युक्त उनका सुवर्णमय सुन्दर ध्वज अत्यन्त शोभा पा रहा था ।। ८२ ।।

ध्वजं तु भीमसेनस्य वैदूर्यमणिलोचनम् । भ्राजमानं महासिंहं राजन्तं दृष्टवानहम् ।। ८३ ।। वैदूर्यमणिमय नेत्रोंसे सुशोभित महासिंहके चिह्नसे युक्त भीमसेनकी चमकीली ध्वजा फहराती हुई बड़ी शोभा पा रही थी। उसे मैंने देखा था ।। ८३ ।।

ध्वजं तु कुरुराजस्य पाण्डवस्य महौजसः । दृष्टवानस्मि सौवर्णं सोमं ग्रहगणान्वितम् ।। ८४ ।। महातेजस्वी कुरुराज पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सुवर्णमयी ध्वजाको मैंने चन्द्रमा तथा ग्रहगणोंके चिह्नसे सुशोभित देखा है ।। ८४ ।।

मृदङ्गौ चात्र विपुलौ दिव्यौ नन्दोपनन्दकौ । यन्त्रेणाहन्यमानौ च सुस्वनौ हर्षवर्धनौ ।। ८५ ।। इस ध्वजामें नन्द-उपनन्द नामक दो विशाल एवं दिव्य मृदंग लगे हुए हैं। वे यन्त्रके द्वारा बिना बजाये बजते हैं और सुन्दर शब्दका विस्तार करके सबका हर्ष बढ़ाते हैं ।। ८५ ।।

शरभं पृष्ठसौवर्णं नकुलस्य महाध्वजम् । अपश्याम रथेऽत्युग्रं भीषयाणमवस्थितम् ॥ ८६ ॥ नकुलकी विशाल ध्वजा शरभके चिह्नसे युक्त तथा पृष्ठभागमें सुवर्णमयी है। हमने देखा, वह अत्यन्त भयंकर रूपसे उनके रथपर फहराती और सबको भयभीत करती थी ॥ ८६ ॥

हंसस्तु राजतः श्रीमान् ध्वजे घण्टापताकवान् । सहदेवस्य दुर्धर्षो द्विषतां शोकवर्धनः ॥ ८७ ॥ सहदेवकी ध्वजामें घंटा और पताकाके साथ चाँदीके बने सुन्दर हंसका चिह्न था। वह दुर्धर्ष ध्वज शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाला था ॥ ८७ ॥

पञ्चानां द्रौपदेयानां प्रतिमा ध्वजभूषणम् । धर्ममारुतशक्राणामश्विनोश्च महात्मनोः ॥ ८८ ॥ क्रमशः धर्म, वायु, इन्द्र तथा महात्मा अश्विनीकुमारोंकी प्रतिमाएँ पाँचों द्रौपदीपुत्रोंके ध्वजोंकी शोभा बढ़ाती थीं ॥

अभिमन्योः कुमारस्य शार्ङ्गपक्षी हिरण्मयः । रथे ध्वजवरो राजंस्तप्तचामीकरोज्ज्वलः ॥ ८९ ॥ राजन्! कुमार अभिमन्युके रथका श्रेष्ठ ध्वज तपाये हुए सुवर्णसे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान था। उसमें सुवर्णमय शार्ङ्गपक्षीका चिह्न था ॥

घटोत्कचस्य राजेन्द्र ध्वजे गृध्रो व्यरोचत । अश्वाश्च कामगास्तस्य रावणस्य पुरा यथा ॥ ९० ॥ राजेन्द्र! राक्षस घटोत्कचकी ध्वजामें गीध शोभा पाता था। पूर्वकालमें रावणके रथकी भाँति उसके रथमें भी इच्छानुसार चलनेवाले घोड़े जुते हुए थे ॥ ९० ॥

माहेन्द्रं च धनुर्दिव्यं धर्मराजे युधिष्ठिरे । वायव्यं भीमसेनस्य धनुर्दिव्यमभून्नृप ॥ ९१ ॥ राजन्! धर्मराज युधिष्ठिरके पास महेन्द्रका दिया हुआ दिव्य धनुष शोभा पाता था। इसी प्रकार भीमसेनके पास वायु देवताका दिया हुआ दिव्य धनुष था ॥ ९१ ॥

त्रैलोक्यरक्षणार्थाय ब्रह्मणा सृष्टमायुधम् । तद् दिव्यमजरं चैव फाल्गुनार्थाय वै धनुः ॥ ९२ ॥ तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने जिस आयुधकी सृष्टि की थी, वह कभी जीर्ण न होनेवाला दिव्य गाण्डीव धनुष अर्जुनको प्राप्त हुआ था ॥ ९२ ॥

वैष्णवं नकुलायाथ सहदेवाय चाश्विजम् ।

घटोत्कचाय पौलस्त्यं धनुर्दिव्यं भयानकम् ॥ ९३ ॥
नकुलको वैष्णव तथा सहदेवको अश्विनीकुमार-सम्बन्धी धनुष प्राप्त था तथा घटोत्कचके पास पौलस्त्य नामक भयानक दिव्य धनुष विद्यमान था ॥ ९३ ॥

रौद्रमाग्नेयकौबेरं याम्यं गिरिशमेव च ।
पञ्चानां द्रौपदेयानां धनूरत्नानि भारत ॥ ९४ ॥
भरतनन्दन! पाँचों द्रौपदीपुत्रोंके दिव्य धनुषरत्न क्रमशः रुद्र, अग्नि, कुबेर, यम तथा भगवान् शंकरसे सम्बन्ध रखनेवाले थे ॥ ९४ ॥

रौद्रं धनुर्वरं श्रेष्ठं लेभे यद् रोहिणीसुतः ।
तत् तुष्टः प्रददौ रामः सौभद्राय महात्मने ॥ ९५ ॥
रोहिणीनन्दन बलरामने जो रुद्रसम्बन्धी श्रेष्ठ धनुष प्राप्त किया था, उसे उन्होंने संतुष्ट होकर महामना सुभद्राकुमार अभिमन्युको दे दिया था ॥ ९५ ॥

एते चान्ये च बहवो ध्वजा हेमविभूषिताः ।
तत्रादृश्यन्त शूराणां द्विषतां शोकवर्धनाः ॥ ९६ ॥
ये तथा और भी बहुत-सी राजाओंकी सुवर्णभूषित ध्वजाएँ वहाँ दिखायी देती थीं, जो शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाली थीं ॥ ९६ ॥

तदभूद् ध्वजसम्बाधमकापुरुषसेवितम् ।
द्रोणानीकं महाराज पटे चित्रमिवार्पितम् ॥ ९७ ॥
महाराज! उस समय वीर पुरुषोंसे भरी हुई द्रोणाचार्यकी वह ध्वजविशिष्ट सेना पटमें अंकित किये हुए चित्रके समान प्रतीत होती थी ॥ ९७ ॥

शुश्रुवुर्नामगोत्राणि वीराणां संयुगे तदा ।
द्रोणमाद्रवतां राजन् स्वयंवर इवाहवे ॥ ९८ ॥
राजन्! उस समय युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यपर आक्रमण करनेवाले वीरोंके नाम और गोत्र उसी प्रकार सुनायी पड़ते थे, जैसे स्वयंवरमें सुने जाते हैं ॥ ९८ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि हयध्वजादिकथने
त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें अश्व और ध्वज आदिका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

१. नीलकण्ठी टीकामें अश्व-शास्त्रके अनुसार घोड़ोंके रंग और लक्षण आदिका परिचय दिया गया है। उसमेंसे कुछ आवश्यक बातें यहाँ यथास्थान उद्धृत की जाती हैं। सारंगका रंग सूचित करनेवाला रंग इस प्रकार है— सितनीलारुणो वर्णः सारंगसदृशश्च सः ।

२. कबूतरका रंग बतानेवाला वचन यों मिलता है— पारावतकपोताभः सितनीलसमन्वयात् ।

३. काम्बोज (काबुल)-के घोड़ोंका लक्षण— महाललाटजघनस्कन्धवक्षोजवा हयाः । दीर्घग्रीवायता ह्रस्वमुष्काः काम्बोजकाः स्मृताः ।। जिनके ललाट, जाँघें, कंधे, छाती और वेग महान् होते हैं, गर्दन लम्बी और चौड़ी होती है तथा अण्डकोष बहुत छोटे होते हैं, वे काबुली घोड़े माने गये हैं।

१. जिस घोड़ेके ललाटके मध्यभागमें ताराके समान श्वेत चिह्न हो, उसके उस चिह्नका नाम ललाम है। उससे युक्त अश्व भी ललाम ही कहलाता है। यथा— श्वेतं ललाटमध्यस्थं तारारूपं हयस्य यत् । ललामं चापि तत्प्राहुर्लामोऽश्वस्तदन्वितः ।।

३. 'हरि' का लक्षण इस प्रकार दिया गया है— सकेशराणि रोमाणि सुवर्णभानि यस्य तु । हरिः स वर्णतोऽश्वस्तु पीतकौशेयसंनिभः ।। जिसकी गर्दनके बड़े-बड़े बाल और शरीरके रोएँ सुनहरे रंगके हों, जो रंगमें रेशमी पीताम्बरके समान जान पड़ता हो, वह घोड़ा 'हरि' कहलाता है।

१. सिंधु देशके घोड़ोंकी गर्दन लम्बी, मूत्रेन्द्रिय मुँहतक पहुँचनेवाली, आँखे बड़ी-बड़ी, कद ऊँचा तथा रोएँ सूक्ष्म होते हैं। सिंधी घोड़े बड़े बलिष्ठ होते हैं, जैसा कि बताया गया है— दीर्घग्रीवा मुखालम्बमेहनाः पृथुलोचनाः । महान्तस्तनुरोमाणो बलिनः सैन्धवा हयाः ।।

३. पद्मवर्णका परिचय इस प्रकार दिया गया है— सितरक्तसमायोगात् पद्मवर्णः प्रकीर्त्यते । सफेद और लाल रंगोंके सम्मिश्रणसे जो रंग होता है, वह पद्मवर्ण कहलाता है।

३. बाह्लिक देशके घोड़े भी प्रायः काबुली घोड़ोंके समान ही होते हैं। उनमें विशेषता इतनी ही है कि उनका पीठभाग काम्बोजदेशीय घोड़ोंकी अपेक्षा बड़ा होता है। जैसा कि निम्नांकित वचनसे स्पष्ट है— काम्बोजसमसंस्थाना बाह्लिजाताश्च वाजिनः । विशेषः पुनरेतेषां दीर्घपृष्ठाङ्गतोच्यते ।।

४. जिनके रोएँ तथा केसर (गर्दनके बाल) सफेद होते हैं, त्वचा, गुह्यभाग, नेत्र, ओठ और खुर काले होते हैं, ऐसे घोड़ोंको महर्षियोंने क्रौंचवर्णका बताया है। यथा— सितलोमकेसराढ्याः कृष्णत्वग्गुह्यलोचनोष्ठखुराः । ये स्युर्मुनिर्भिर्वाहा निर्दिष्टाः क्रौञ्चवर्णास्ते ।।


* ये वसुदान २१।५५ में मारे गये वसुदानसे भिन्न हैं। इन्हें कहीं-कहीं 'काश्य' बताया गया है। सम्भाव है, ये ही काशिराज हों।
* यद्यपि सिंहसेन और व्याघ्रदत्तके मारे जानेका वर्णन (१६।३७ में) आ चुका है। तथापि यहाँ घोड़ोंके वर्णनके प्रसंगमें संजयने सामान्यतः सबके घोड़ोंका उल्लेख कर दिया है। मृत्युसे पहले वे दोनों वैसे ही घोड़ोंपर आरूढ़ हो रणभूमिमें पधारे थे।
* इन्हींका वर्णन पहले श्लोक ५६ में भी आ चुका है।

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चतुर्विंशोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका अपना खेद प्रकाशित करते हुए युद्धके समाचार पूछना

धृतराष्ट्र उवाच

व्यथयेयुरिमे सेनां देवानामपि संजय ।
आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा नृपाः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! भीमसेन आदि जो-जो नरेश युद्धमें लौटकर आये थे, ये तो देवताओंकी सेनाको भी पीड़ित कर सकते हैं ॥ १ ॥

सम्प्रयुक्तः किलैवायं दिष्टैर्भवति पूरुषः ।
तस्मिन्नेव च सर्वार्थाः प्रदृश्यन्ते पृथग्विधाः ॥ २ ॥
निश्चय ही यह मनुष्य दैवसे प्रेरित होता है। सबके पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण मनोरथ दैवपर ही अवलम्बित दिखायी देते हैं ॥ २ ॥

दीर्घं विप्रोषितः कालमरण्ये जटिलोऽजिनी ।
अज्ञातश्चैव लोकस्य विजहार युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
स एव महतीं सेनां समावर्तयदाहवे ।
किमन्यद् दैवसंयोगान्मम पुत्रस्य चाभवत् ॥ ४ ॥
जो राजा युधिष्ठिर दीर्घकालतक जटा और मृगचर्म धारण करके वनमें रहे और कुछ कालतक लोगोंसे अज्ञात रहकर भी विचरे हैं, वे ही आज रणभूमिमें विशाल सेना जुटाकर चढ़ आये हैं, इसमें मेरे तथा पुत्रोंके दैवयोगके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥

युक्त एव हि भाग्येन ध्रुवमुत्पद्यते नरः ।
स तथाऽऽकृष्यते तेन न यथा स्वयमिच्छति ॥ ५ ॥
निश्चय ही मनुष्य भाग्यसे युक्त होकर ही जन्म ग्रहण करता है। भाग्य उसे उस अवस्थामें भी खींच ले जाता है, जिसमें वह स्वयं नहीं जाना चाहता ॥ ५ ॥

द्यूतव्यसनमासाद्य क्लेशितो हि युधिष्ठिरः ।
स पुनर्भागधेयेन सहायानुपलब्धवान् ॥ ६ ॥
हमने द्यूतके संकटमें डालकर युधिष्ठिरको भारी क्लेश पहुँचाया था, परंतु उन्होंने भाग्यसे पुनः बहुतेरे सहायकोंको प्राप्त कर लिया है ॥ ६ ॥

अद्य मे केकया लब्धाः काशिकाः कोसलाश्र्च ये ।
चेदयश्रापरे वङ्गा मामेव समुपाश्रिताः ॥ ७ ॥
पृथिवी भूयसी तात मम पार्थस्य नो तथा ।

इति मामब्रवीत् सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा ॥ ८ ॥ सूत संजय! आजसे बहुत पहलेकी बात है, मूर्ख दुर्योधनने मुझसे कहा था कि 'पिताजी! इस समय केकय, काशी, कोसल तथा चेदिदेशके लोग मेरी सहायताके लिये आ गये हैं। दूसरे वंगवासियोंने भी मेरा ही आश्रय लिया है। तात! इस भूमण्डलका बहुत बड़ा भाग मेरे साथ है, अर्जुनके साथ नहीं है' ॥ ७-८ ॥ तस्य सेनासमूहस्य मध्ये द्रोणः सुरक्षितः । निहतः पार्षतेनाजौ किमन्यद् भागधेयतः ॥ ९ ॥ उसी विशाल सेनासमूहके मध्य सुरक्षित हुए द्रोणाचार्यको युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नने मार डाला, इसमें भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ९ ॥ मध्ये राज्ञां महाबाहुं सदा युद्धाभिनन्दिनम् । सर्वास्त्रपारगं द्रोणं कथं मृत्युरुपेयिवान् ॥ १० ॥ राजाओंके बीचमें सदा युद्धका अभिनन्दन करनेवाले सम्पूर्ण अस्त्र-विद्याके पारंगत विद्वान् महाबाहु द्रोणाचार्यको कैसे मृत्यु प्राप्त हुई? ॥ १० ॥ समनुप्राप्तकृच्छ्रोऽहं मोहं परममागतः । भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ११ ॥ मुझपर महान् संकट आ पहुँचा है। मेरी बुद्धिपर अत्यन्त मोह छा गया है। मैं भीष्म और द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर जीवित नहीं रह सकता ॥ ११ ॥ यन्मां क्षत्ताब्रवीत् तात प्रपश्यन् पुत्रगृद्धिनम् । दुर्योधनेन तत् सर्वं प्राप्तं सूत मया सह ॥ १२ ॥ तात! मुझे अपने पुत्रोंके प्रति अत्यन्त आसक्त देखकर विदुरने मुझसे जो कुछ कहा था, मेरे साथ दुर्योधनको वह सब प्राप्त हो रहा है ॥ १२ ॥ नृशंसं तु परं नु स्यात् त्यक्त्वा दुर्योधनं यदि । पुत्रशेषं चिकीर्षेयं कृत्स्नं न मरणं व्रजेत् ॥ १३ ॥ यदि मैं दुर्योधनको त्यागकर शेष पुत्रोंकी रक्षा करना चाहूँ तो यह अत्यन्त निष्ठुरताका कार्य अवश्य होगा, परंतु मेरे सारे पुत्रोंकी तथा अन्य सब लोगोंकी भी मृत्यु नहीं होगी ॥ १३ ॥ यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः । सोऽस्माच्च हीयते लोकात् क्षुद्रभावं च गच्छति ॥ १४ ॥ जो मनुष्य धर्मका परित्याग करके अर्थपरायण हो जाता है, वह इस लोकसे (लौकिक स्वार्थसे) भ्रष्ट हो जाता है और नीच गतिको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ अद्य चाप्यस्य राष्ट्रस्य हतोत्साहस्य संजय । अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ १५ ॥

संजय! आज इस राष्ट्रका उत्साह भंग हो गया। प्रधानके मारे जानेसे अब मुझे किसीका जीवन शेष रहता नहीं दिखायी देता ॥ १५ ॥
कथं स्यादवशेषो हि धुर्ययोरभ्यतीतयोः ।
यौ नित्यमुपजीवामः क्षमिणौ पुरुषर्षभौ ॥ १६ ॥
हमलोग सदा जिन सर्वसमर्थ पुरुषसिंहोंका आश्रय लेकर जीवन धारण करते थे, उन धुरंधर वीरोंके इस लोकसे चले जानेपर अब हमारी सेनाका कोई भी सैनिक कैसे जीवित बच सकता है ॥ १६ ॥
व्यक्तमेव च मे शंस यथा युद्धमवर्तत ।
केऽयुध्यन् के व्यपाकुर्वन् के क्षुद्राः प्राद्रवन् भयात् ॥ १७ ॥
संजय! वह युद्ध जिस प्रकार हुआ था, सब साफ-साफ मुझसे बताओ। कौन-कौन वीर युद्ध करते थे, कौन किसको परास्त करते थे और कौन-कौन-से क्षुद्र सैनिक भयके कारण युद्धके मैदानसे भाग गये थे ॥
धनंजयं च मे शंस यद् यच्चक्रे रथर्षभः ।
तस्माद् भयं नो भूयिष्ठं भ्रातृव्याच्च वृकोदरात् ॥ १८ ॥
धनंजय अर्जुनके विषयमें भी मुझे बताओ। रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने क्या-क्या किया था। मुझे उनसे तथा शत्रुस्वरूप भीमसेनसे अधिक भय लगता है ॥ १८ ॥
यथाऽऽसीच्च निवृत्तेषु पाण्डवेयेषु संजय ।
मम सैन्यावशेषस्य संनिपातः सुदारुणः ॥ १९ ॥
संजय! पाण्डव-सैनिकोंके पुनः युद्धभूमिमें लौट आनेपर मेरी शेष सेनाके साथ जिस प्रकार उनका अत्यन्त भयंकर संग्राम हुआ था, वह कहो ॥ १९ ॥
कथं च वो मनस्तात निवृत्तेष्वभवत् तदा ।
मामकानां च ये शूराः के कांस्तत्र न्यवारयन् ॥ २० ॥
तात! पाण्डव-सैनिकोंके लौटनेपर तुमलोगोंके मनकी कैसी दशा हुई? मेरे पुत्रोंकी सेनामें जो शूरवीर थे, उनमेंसे किन लोगोंने शत्रुपक्षके किन वीरोंको रोका था? ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥

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पञ्चविंशोऽध्यायः

कौरव-पाण्डव-सैनिकोंके द्वन्द्व-युद्ध

संजय उवाच

महद् भैरवमासीन्नः संनिवृत्तेषु पाण्डुषु ।
दृष्ट्वा द्रोणं छाद्यमानं तैर्भास्करमिवाम्बुदैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! पाण्डव-सैनिकोंके लौटनेपर जैसे बादलोंसे सूर्य ढक जाते हैं, उसी प्रकार उनके बाणोंसे द्रोणाचार्य आच्छादित होने लगे। यह देखकर हमलोगोंने उनके साथ बड़ा भयंकर संग्राम किया ॥ १ ॥

तैश्चोद्धूतं रजस्तीव्रमवचक्रे चमूं तव ।
ततो हतममंस्याम द्रोणं दृष्टिपथे हते ॥ २ ॥
उन सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई तीव्र धूलने आपकी सारी सेनाको ढक दिया। फिर तो हमारी दृष्टिका मार्ग अवरुद्ध हो गया और हमने समझ लिया कि द्रोण मारे गये ॥ २ ॥

तांस्तु शूरान् महेष्वासान् क्रूरं कर्म चिकीर्षतः ।
दृष्ट्वा दुर्योधनस्तूर्णं स्वसैन्यं समचूचुदत् ॥ ३ ॥
उन महाधनुर्धर शूरवीरोंको क्रूर कर्म करनेके लिये उत्सुक देख दुर्योधनने तुरंत ही अपनी सेनाको इस प्रकार आज्ञा दी— ॥ ३ ॥

यथाशक्ति यथोत्साहं यथासत्त्वं नराधिपाः ।
वारयध्वं यथायोगं पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ४ ॥
‘नरेश्वरो! तुम सब लोग अपनी शक्ति, उत्साह और बलके अनुसार यथोचित उपायद्वारा पाण्डवोंकी सेनाको रोको’ ॥ ४ ॥

ततो दुर्मर्षणो भीममभ्यगच्छत् सुतस्तव ।
आराद् दृष्ट्वा किरन् बाणैर्जिघृक्षुस्तस्य जीवितम् ॥ ५ ॥
तब आपके पुत्र दुर्मर्षणने भीमसेनको अपने पास ही देखकर उनके प्राण लेनेकी इच्छासे बाणोंकी वर्षा करते हुए उनपर आक्रमण किया ॥ ५ ॥

तं बाणैरवतस्तार क्रुद्धो मृत्युरिवाहवे ।
तं च भीमोऽतुदद् बाणैस्तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् ॥ ६ ॥
उसने क्रोधमें भरी हुई मृत्युके समान युद्धस्थलमें बाणोंद्वारा भीमसेनको ढक दिया। साथ ही भीमसेनने भी अपने बाणोंद्वारा उसे गहरी चोट पहुँचायी। इस प्रकार उन दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा ॥ ६ ॥

त ईश्वरसमादिष्टाः प्राज्ञाः शूराः प्रहारिणः ।
राज्यं मृत्युभयं त्यक्त्वा प्रत्यतिष्ठन् परान् युधि ॥ ७ ॥

अपने स्वामी राजा दुर्योधनकी आज्ञा पाकर वे प्रहार करनेमें कुशल बुद्धिमान् शूरवीर राज्यको और मृत्युके भयको छोड़कर युद्धस्थलमें शत्रुओंका सामना करने लगे ।। ७ ।। कृतवर्मा शिनेः पौत्रं द्रोणं प्रेप्सुं विशाम्पते । पर्यवारयदायान्तं शूरं समरशोभिनम् ।। ८ ।। प्रजानाथ! द्रोणको अपने वशमें करनेकी इच्छासे आगे बढ़ते हुए संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर सात्यकिको कृतवर्माने रोक दिया ।। ८ ।। तं शैनेयः शरव्रातैः क्रुद्धः क्रुद्धमवारयत् । कृतवर्मा च शैनेयं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ।। ९ ।। तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने कुपित हुए कृतवर्माको अपने बाणसमूहोंद्वारा आगे बढ़नेसे रोका और कृतवर्माने सात्यकिको। ठीक उसी तरह, जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले गजराजको रोक देता है ।। सैन्धवः क्षत्रवर्माणमायान्तं निशितैः शरैः । उग्रधन्वा महेष्वासं यत्तो द्रोणादवारयत् ।। १० ।। भयंकर धनुष धारण करनेवाले सिंधुराज जयद्रथने महाधनुर्धर क्षत्रवर्माको अपने तीखे बाणोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक द्रोणाचार्यकी ओर आनेसे रोक दिया ।। १० ।। क्षत्रवर्मा सिन्धुपतेश्छित्त्वा केतनकार्मुके । नाराचैर्दशभिः क्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडयत् ।। ११ ।। क्षत्रवर्माने कुपित हो सिंधुराज जयद्रथके ध्वज और धनुष काटकर दस नाराचोंद्वारा उसके सभी मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचायी ।। ११ ।। अथान्यद् धनुरदाय सैन्धवः कृतहस्तवत् । विव्याध क्षत्रवर्माणं रणे सर्वायसैः शरैः ।। १२ ।। तब सिंधुराजने दूसरा धनुष लेकर सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति सम्पूर्णतः लोहेके बने हुए बाणोंद्वारा रणक्षेत्रमें क्षत्रवर्माको घायल कर दिया ।। १२ ।। युयुत्सुं पाण्डवार्थाय यतमानं महारथम् । सुबाहुर्भारतं शूरं यत्तो द्रोणादवारयत् ।। १३ ।। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके हितके लिये प्रयत्न करनेवाले भरतवंशी महारथी शूरवीर युयुत्सुको सुबाहुने प्रयत्नपूर्वक द्रोणाचार्यकी ओर आनेसे रोक दिया ।। सुबाहोः सधनुर्बाणावस्यतः परिघोपमौ । युयुत्सुः शितपीताभ्यां क्षुराभ्यामच्छिनद्भुजौ ।। १४ ।। तब युयुत्सुने प्रहार करते हुए सुबाहुकी परिघके समान मोटी एवं धनुष-बाणोंसे युक्त दोनों भुजाओंको अपने तीखे और पानीदार दो छुरोंद्वारा काट गिराया ।। राजानं पाण्डवश्रेष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । वेलेव सागरं क्षुब्धं मद्रराट् समवारयत् ।। १५ ।।

पाण्डवश्रेष्ठ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको मद्रराज शल्यने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे क्षुब्ध महासागरको तटकी भूमि रोक देती है ॥ १५ ॥ तं धर्मराजो बहुभिर्मर्मभिद्भिर्वाकिरत् । मद्रेशस्तं चतुःषष्ट्या शरैर्विद्ध्वानदद् भृशम् ॥ १६ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने शल्यपर बहुत-से मर्मभेदी बाणोंकी वर्षा की। तब मद्रराज भी चौंसठ बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल करके जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १६ ॥ तस्य ननदतः केतुमुच्चकर्त च कार्मुकम् । क्षुराभ्यां पाण्डवो ज्येष्ठस्तत उच्चक्रुशुर्जनाः ॥ १७ ॥ तब ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरने दो क्षुरोंद्वारा गर्जना करते हुए राजा शल्यके ध्वज और धनुषको काट डाला। यह देख सब लोग हर्षसे कोलाहल कर उठे ॥ १७ ॥ तथैव राजा बाह्लीको राजानं द्रुपदं शरैः । आद्रवन्तं सहानीकः सहानीकं न्यवारयत् ॥ १८ ॥ इसी प्रकार अपनी सेनासहित राजा बाह्लीकने सैनिकोंके साथ धावा करते हुए राजा द्रुपदको अपने बाणोंद्वारा रोक दिया ॥ १८ ॥ तद् युद्धमभवद् घोरं वृद्धयोः सहसेनयोः । यथा महायूथपयोर्द्विपयोः सम्प्रभिन्नयोः ॥ १९ ॥ जैसे मदकी धारा बहानेवाले दो विशाल गजयूथपतियोंमें लड़ाई होती है, उसी प्रकार सेनासहित उन दोनों वृद्ध नरेशोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं मत्स्यमार्च्छताम् । सहसैन्यौ सहानीकं यथेन्द्राग्नी पुरा बलिम् ॥ २० ॥ अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दने अपनी सेनाओंको साथ लेकर विशाल वाहिनीसहित मत्स्यराज विराटपर उसी प्रकार धावा किया, जैसे पूर्वकालमें अग्नि और इन्द्रने राजा बलिपर आक्रमण किया था ॥ तदुत्पिञ्जलकं युद्धमासीद् देवासुरोपमम् । मत्स्यानां केकयैः सार्धमभीताश्वरथद्विपम् ॥ २१ ॥ उस समय मत्स्यदेशीय सैनिकोंका केकयदेशीय योद्धाओंके साथ देवासुर-संग्रामके समान अत्यन्त घमासान युद्ध हुआ। उसमें हाथी, घोड़े और रथ सभी निर्भय होकर एक-दूसरेसे लड़ रहे थे ॥ २१ ॥ नाकुलिं तु शतानीकं भूतकर्मा सभापतिः । अस्यन्तमिषुजालानि यान्तं द्रोणादवारयत् ॥ २२ ॥ नकुलका पुत्र शतानीक बाण-समूहोंकी वर्षा करता हुआ द्रोणाचार्यकी ओर बढ़ रहा था। उस समय भूतकर्मा सभापतिने उसे द्रोणकी ओर आनेसे रोक दिया ॥ ततो नकुलदायादस्तत्रिभिर्भल्लैः सुसंशितैः ।

चक्रे विबाहुशिरसं भूतकर्माणमाहवे ॥ २३ ॥ तदनन्तर नकुलके पुत्रने तीन तीखे भल्लोंद्वारा युद्धमें भूतकर्माकी बाहु तथा मस्तक काट डाले ॥ २३ ॥ सुतसोमं तु विक्रान्तमायान्तं तं शरौघिणम् । द्रोणायाभिमुखं वीरं विविंशतिरवारयत् ॥ २४ ॥ पराक्रमी वीर सुतसोम बाण-समूहोंकी बौछार करता हुआ द्रोणाचार्यके सम्मुख आ रहा था। उसे विविंशतिने रोक दिया ॥ २४ ॥ सुतसोमस्तु संक्रुद्धः स्वपितृव्यमजिह्मगैः । विविंशतिं शरैर्भित्त्वा नाभ्यवर्तत दंशितः ॥ २५ ॥ तब सुतसोमने अत्यन्त कुपित हो अपने चाचा विविंशतिको सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा घायल कर दिया और स्वयं एक वीर पुरुषकी भाँति कवच बाँधे सामने खड़ा रहा ॥ २५ ॥ अथ भीमरथः शाल्वमाशुगैरायसैः शितैः । षड्भिः साश्वनियन्तारमनयद् यमसादनम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर भीमरथने छः तीखे लोहमय शीघ्रगामी बाणोंद्वारा सारथिसहित शाल्वको यमलोक पहुँचा दिया ।। श्रुतकर्माणमायान्तं मयूरसदृशैर्हयैः । चैत्रसेनिर्महाराज तव पौत्रं न्यवारयत् ॥ २७ ॥ महाराज! श्रुतकर्मा मोरके समान रंगवाले घोड़ोंपर आ रहा था। उस आपके पौत्र श्रुतकर्माको चित्रसेनके पुत्रने रोका ।। २७ ।। तौ पौत्रौ तव दुर्धर्षौ परस्परवधैषिणौ । पितॄणामर्थसिद्ध्यर्थं चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ॥ २८ ॥ आपके दोनों दुर्जय पौत्र एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखकर अपने पितृगणोंका मनोरथ सिद्ध करनेके लिये अच्छी तरह युद्ध करने लगे ।। २८ ।। तिष्ठन्तमग्रे तं दृष्ट्वा प्रतिविन्ध्यं महाहवे । द्रौणिर्मानं पितुः कुर्वन् मार्गणैः समवारयत् ॥ २९ ॥ उस महासमरमें प्रतिविन्ध्यको द्रोणाचार्यके सामने खड़ा देख पिताका सम्मान करते हुए अश्वत्थामाने बाणोंद्वारा रोक दिया ।। २९ ।। तं क्रुद्धं प्रतिविव्याध प्रतिविन्ध्यः शितैः शरैः । सिंहलाङ्गूललक्ष्माणं पितुरर्थे व्यवस्थितम् ॥ ३० ॥ जिसके ध्वजमें सिंहके पूँछका चिह्न था और जो पिताकी इष्ट सिद्धिके लिये खड़ा था, उस क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाको प्रतिविन्ध्यने अपने पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ।। ३० ।। प्रवपन्निव बीजानि बीजकाले नरर्षभ । द्रौणायनिर्द्रौपदेयं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३१ ॥

नरश्रेष्ठ! तब द्रोणपुत्र भी द्रौपदीकुमार प्रतिविन्ध्यपर बाणोंकी वर्षा करने लगा, मानो किसान बीज बोनेके समयपर खेतमें बीज डाल रहा हो ॥ ३१ ॥ आर्जुनिं श्रुतकीर्तिं तु द्रौपदेयं महारथम् । द्रोणायाभिमुखं यान्तं दौःशासनिरवारयत् ॥ ३२ ॥ तदनन्तर अर्जुनपुत्र द्रौपदीकुमार महारथी श्रुतकीर्तिको द्रोणाचार्यके सामने जाते देख दुःशासनके पुत्रने रोका ॥ तस्य कृष्णसमः कार्ष्णिस्त्रिभिर्भल्लैः सुसंशितैः । धनुर्ध्वजं च सूतं च छित्त्वा द्रोणान्तिकं ययौ ॥ ३३ ॥ तब अर्जुनके समान पराक्रमी अर्जुनकुमार तीन अत्यन्त तीखे भल्लोंद्वारा दुःशासनपुत्रके धनुष, ध्वज और सारथिके टुकड़े-टुकड़े करके द्रोणाचार्यके समीप जा पहुँचा ॥ ३३ ॥ यस्तु शूरतमो राजन्नुभयोः सेनयोर्मतः । तं पटच्चरहन्तारं लक्ष्मणः समवारयत् ॥ ३४ ॥ राजन्! जो दोनों सेनाओंमें सबसे अधिक शूरवीर माना जाता था, डाकू और लुटेरोंको मारनेवाले उस समुद्री प्रान्तोंके अधिपति‌को दुर्योधनपुत्र लक्ष्मणने रोका ॥ स लक्ष्मणस्येष्वसनं छित्त्वा लक्ष्म च भारत । लक्ष्मणे शरजालानि विसृजन् बह्वशोभत ॥ ३५ ॥ भारत! तब वह लक्ष्मणके धनुष और ध्वजचिह्नको काटकर उसके ऊपर बाण-समूहोंकी वर्षा करता हुआ बहुत शोभा पाने लगा ॥ ३५ ॥ विकर्णस्तु महाप्राज्ञो याज्ञसेनिं शिखण्डिनम् । पर्यवारयदायान्तं युवानं समरे युवा ॥ ३६ ॥ परम बुद्धिमान् नवयुवक विकर्णने युवावस्थासे सम्पन्न द्रुपदकुमार शिखण्डीको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोका ॥ ततस्तमिषुजालेन याज्ञसेनिः समावृणोत् । विधूय तद् बाणजालं बभौ तव सुतो बली ॥ ३७ ॥ तब शिखण्डीने अपने बाण-समूहसे विकर्णको आच्छादित कर दिया। आपका बलवान् पुत्र उस सायक-जालको छिन्न-भिन्न करके बड़ी शोभा पाने लगा ॥ ३७ ॥ अङ्गदोऽभिमुखं वीरमुत्तमौजसमाहवे । द्रोणायाभिमुखं यान्तं शरौघेन न्यवारयत् ॥ ३८ ॥ अंगदने वीर उत्तमौजाको अपने और द्रोणाचार्यके सामने आते देख युद्धस्थलमें अपने बाणसमुदायकी वर्षासे रोक दिया ॥ ३८ ॥ स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोः पुरुषसिंहयोः । सैनिकानां च सर्वेषां तयोश्च प्रीतिवर्धनः ॥ ३९ ॥

उन दोनों पुरुषसिंहोंमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। वह संग्राम समस्त सैनिकोंकी तथा उन दोनोंकी भी प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ ३९ ॥
दुर्मुखस्तु महेष्वासो वीरं पुरुजितं बली ।
द्रोणायाभिमुखं यान्तं वत्सदन्तैरवारयत् ॥ ४० ॥
महाधनुर्धर बलवान् दुर्मुखने द्रोणाचार्यके सामने जाते हुए वीर पुरुजित्‌को वत्सदन्तोंके प्रहारद्वारा रोक दिया ॥ ४० ॥
स दुर्मुखं भ्रुवोर्मध्ये नाराचेनाभ्यताडयत् ।
तस्य तद् विभभौ वक्त्रं सनालमिव पङ्कजम् ॥ ४१ ॥
तब पुरुजित्‌ने एक नाराचद्वारा दुर्मुखपर उसकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें प्रहार किया। उस समय दुर्मुखका मुख मृणालयुक्त कमलके समान सुशोभित हुआ ॥ ४१ ॥
कर्णस्तु केकयान् भ्रातॄन् पञ्च लोहितकध्वजान् ।
द्रोणायाभिमुखं यातान् शरवर्षैरवारयत् ॥ ४२ ॥
कर्णने लाल रंगकी ध्वजासे सुशोभित पाँचों भाई केकयराजकुमारोंको द्रोणाचार्यके सम्मुख जाते देख उन्हें बाणोंकी वर्षासे रोक दिया ॥ ४२ ॥
ते चैनं भृशसंतप्ताः शरवर्षैरवाकिरन् ।
स च तांश्छादयामास शरजालैः पुनः पुनः ॥ ४३ ॥
तब वे अत्यन्त संतप्त हो कर्णपर बाणोंकी झड़ी लगाने लगे और कर्णने भी अपने बाणोंके समूहसे उन्हें बार-बार आच्छादित कर दिया ॥ ४३ ॥
नैव कर्णो न ते पञ्च ददृशुर्बाणसंवृताः ।
साश्वसूतध्वजरथाः परस्परशराचिताः ॥ ४४ ॥
कर्ण तथा वे पाँचों राजकुमार एक-दूसरेके बरसाये हुए बाण-समूहोंसे व्याप्त एवं आच्छादित होकर घोड़े, सारथि, ध्वज तथा रथसहित अदृश्य हो गये थे ॥ ४४ ॥
पुत्रास्ते दुर्जयश्चैव जयश्च विजयश्च ह ।
नीलकाश्यजयत्सेनांस्त्रयस्त्रीन् प्रत्यवारयन् ॥ ४५ ॥
राजन्! आपके तीन पुत्र दुर्जय, जय और विजयने नील, काश्य तथा जयत्सेन—इन तीनोंको रोक दिया ॥
तद् युद्धमभवद् घोरमीक्षितृप्रीतिवर्धनम् ।
सिंहव्याघ्रतरक्षूणां यथर्क्षमहिषर्षभैः ॥ ४६ ॥
उन सबमें भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो सिंह, व्याघ्र और तेंदुओं (जखों)-का रीछों, भैंसों तथा साँड़ोंके साथ होनेवाले युद्धके समान दर्शकोंके हर्षको बढ़ानेवाला था ॥ ४६ ॥
क्षेमधूर्तिर्बृहन्तौ तु भ्रातरौ सात्वतं युधि ।
द्रोणायाभिमुखं यान्तं शरैस्तीक्ष्णैस्ततक्षतुः ॥ ४७ ॥

क्षेमधूर्ति और बृहन्त—ये दोनों भाई युद्धमें द्रोणाचार्यके सामने जाते हुए सात्यकिको अपने पैने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ४७ ॥ तयोस्तस्य च तद् युद्धमत्यद्भुतमिवाभवत् । सिंहस्य द्विपमुख्याभ्यां प्रभिन्नाभ्यां यथा वने ॥ ४८ ॥ जैसे वनमें दो मदस्रावी गजराजोंके साथ एक सिंहका युद्ध हो रहा हो, उसी प्रकार उन दोनों भाइयों तथा सात्यकिका युद्ध अत्यन्त अद्भुत-सा हो रहा था ॥ ४८ ॥ राजानं तु तथम्बष्ठमेकं युद्धाभिनन्दिनम् । चेदिराजः शरानस्यन् क्रुद्धो द्रोणादवारयत् ॥ ४९ ॥ युद्धका अभिनन्दन करनेवाले राजा अम्बष्ठको क्रोधमें भरे हुए चेदिराजने बाणोंकी वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यके पास आनेसे रोक दिया ॥ ४९ ॥ ततोऽम्बष्ठोऽस्थिभेदिन्या निरभिद्यच्छलाकया । स त्यक्त्वा सशरं चापं रथाद् भूमिमुपागमत् ॥ ५० ॥ तब अम्बष्ठने हड्डियोंको छेद देनेवाली शलाकाद्वारा चेदिराजको विदीर्ण कर दिया। वे बाणसहित धनुषको त्यागकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५० ॥ वार्धक्षेमिं तु वार्ष्णेयं कृपः शारद्वतः शरैः । अक्षुद्रः क्षुद्रकैर्द्रोणात् क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ५१ ॥ शरद्वान्‌के पुत्र श्रेष्ठ कृपाचार्यने क्रोधमें भरे हुए वृष्णिवंशी वार्धक्षेमिको अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यके पास आनेसे रोका ॥ ५१ ॥ युध्यन्तौ कृपवार्ष्णेयौ येऽपश्यंश्चित्रयोधिनौ । ते युद्धासक्तमनसो नान्यां बुबुधिरे क्रियाम् ॥ ५२ ॥ कृपाचार्य और वृष्णिवंशी वीर वार्धक्षेमि विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे। जिन लोगोंने उन दोनोंको युद्ध करते देखा, उनका मन उसीमें आसक्त हो गया। उन्हें दूसरी किसी क्रियाका भान नहीं रहा ॥ ५२ ॥ सौमदत्तिस्तु राजानं मणिमन्तमतन्द्रितम् । पर्यवारयदायान्तं यशो द्रोणस्य वर्धयन् ॥ ५३ ॥ सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाने द्रोणाचार्यका यश बढ़ाते हुए उनपर आक्रमण करनेवाले आलस्यरहित राजा मणिमान्‌को रोक दिया ॥ ५३ ॥ स सौमदत्तेस्त्वरितश्चित्रेष्वसनकेतने । पुनः पताकां सूतं च छत्रं चापातयद् रथात् ॥ ५४ ॥ तब उन्होंने तुरंत ही शूरिश्रवाके विचित्र धनुष, ध्वजा-पताका, सारथि और छत्रको रथसे काट गिराया ॥ ५४ ॥ अथाप्लुत्य रथात् तूर्णं यूपकेतुरमित्रहा । साश्वसूतध्वजरथं तं चकर्त वरासिना ॥ ५५ ॥

यह देख यूपके चिह्नसे सुशोभित ध्वजवाले शत्रुसूदन भूरिश्रवाने तुरंत ही रथसे कूदकर लंबी तलवारसे घोड़े, सारथि, ध्वज एवं रथसहित राजा मणिमान्‌को काट डाला ॥ ५५ ॥
रथं च स्वं समास्थाय धनुरादाय चापरम् ।
स्वयं यच्छन् हयान् राजन् व्यधमत् पाण्डवीं चमूम् ॥ ५६ ॥
राजन्! तत्पश्चात् भूरिश्रवा अपने रथपर बैठकर स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें रखता हुआ दूसरा धनुष हाथमें ले पाण्डव-सेनाका संहार करने लगा ॥ ५६ ॥
पाण्ड्यमिन्द्रमिवायान्तमसुरान् प्रति दुर्जयम् ।
समर्थः सायकौघेन वृषसेनो न्यवारयत् ॥ ५७ ॥
जैसे इन्द्र असुरोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यपर धावा करनेवाले दुर्जय वीर पाण्ड्यको शक्तिशाली वीर वृषसेनने अपने सायकसमूहसे रोक दिया ॥ ५७ ॥
गदापरिघनिस्त्रिंशपट्टिशायोधनोपलैः ।
कडङ्गरैर्भुशुण्डीभिः प्रासैस्तोमरसायकैः ॥ ५८ ॥
मुसलैर्मुद्गरैश्चक्रैर्भिन्दिपालपरश्वधैः ।
पांसुवाताग्निसलिलैर्भस्मलोष्टतृणद्रुमैः ॥ ५९ ॥
आतुदन् प्ररुजन् भञ्जन् निघ्नन् विद्रावयन् क्षिपन् ।
सेनां विभीषयन्नायाद् द्रौणप्रेप्सुर्घटोत्कचः ॥ ६० ॥
तत्पश्चात् गदा, परिघ, खड्ग, पट्टिश, लोहेके घन, पत्थर, कडंगर, भुशुण्डि, प्रास, तोमर, सायक, मुसल, मुद्गर, चक्र, भिन्दिपाल, फरसा, धूल, हवा, अग्नि, जल, भस्म, मिट्टीके ढेले, तिनके तथा वृक्षोंसे कौरव-सेनाको पीड़ा देता, शत्रुओंका अंग-भंग करता, तोड़ता-फोड़ता, मारता-भगाता, फेंकता एवं सारी सेनाको भयभीत करता हुआ घटोत्कच वहाँ द्रोणाचार्यको पकड़नेके लिये आया ॥ ५८—६० ॥
तं तु नानाप्रहरणैर्नानायुद्धविशेषणैः ।
राक्षसं राक्षसः क्रुद्धः समाजघ्ने ह्यलम्बुषः ॥ ६१ ॥
उस समय उस राक्षसको क्रोधमें भरे हुए अलम्बुष नामक राक्षसने ही अनेकानेक युद्धोंमें उपयोगी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥
तयोस्तदभवद् युद्धं रक्षोग्रामणिमुख्ययोः ।
तादृग् यादृक् पुरावृत्तं शम्बरामरराज्ययोः ॥ ६२ ॥
उन दोनों श्रेष्ठ राक्षसयूथपतियोंमें वैसा ही युद्ध हुआ, जैसा कि पूर्वकालमें शम्बरासुर तथा देवराज इन्द्रमें हुआ था ॥ ६२ ॥
(भारद्वाजस्तु सेनान्यं धृष्टद्युम्नं महारथम् ।
तमेव राजन्नायान्तमतिक्रम्य परान् रिपून् ॥
महता शरजालेन किरन्तं शत्रुवाहिनीम् ।
अवारयन्महाराज सामात्यं सपदानुगम् ॥