महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका अपना खेद प्रकाशित करते हुए युद्धके समाचार पूछना
धृतराष्ट्र उवाच
व्यथयेयुरिमे सेनां देवानामपि संजय ।
आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा नृपाः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! भीमसेन आदि जो-जो नरेश युद्धमें लौटकर आये थे, ये तो देवताओंकी सेनाको भी पीड़ित कर सकते हैं ॥ १ ॥
सम्प्रयुक्तः किलैवायं दिष्टैर्भवति पूरुषः ।
तस्मिन्नेव च सर्वार्थाः प्रदृश्यन्ते पृथग्विधाः ॥ २ ॥
निश्चय ही यह मनुष्य दैवसे प्रेरित होता है। सबके पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण मनोरथ दैवपर ही अवलम्बित दिखायी देते हैं ॥ २ ॥
दीर्घं विप्रोषितः कालमरण्ये जटिलोऽजिनी ।
अज्ञातश्चैव लोकस्य विजहार युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
स एव महतीं सेनां समावर्तयदाहवे ।
किमन्यद् दैवसंयोगान्मम पुत्रस्य चाभवत् ॥ ४ ॥
जो राजा युधिष्ठिर दीर्घकालतक जटा और मृगचर्म धारण करके वनमें रहे और कुछ कालतक लोगोंसे अज्ञात रहकर भी विचरे हैं, वे ही आज रणभूमिमें विशाल सेना जुटाकर चढ़ आये हैं, इसमें मेरे तथा पुत्रोंके दैवयोगके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥
युक्त एव हि भाग्येन ध्रुवमुत्पद्यते नरः ।
स तथाऽऽकृष्यते तेन न यथा स्वयमिच्छति ॥ ५ ॥
निश्चय ही मनुष्य भाग्यसे युक्त होकर ही जन्म ग्रहण करता है। भाग्य उसे उस अवस्थामें भी खींच ले जाता है, जिसमें वह स्वयं नहीं जाना चाहता ॥ ५ ॥
द्यूतव्यसनमासाद्य क्लेशितो हि युधिष्ठिरः ।
स पुनर्भागधेयेन सहायानुपलब्धवान् ॥ ६ ॥
हमने द्यूतके संकटमें डालकर युधिष्ठिरको भारी क्लेश पहुँचाया था, परंतु उन्होंने भाग्यसे पुनः बहुतेरे सहायकोंको प्राप्त कर लिया है ॥ ६ ॥
अद्य मे केकया लब्धाः काशिकाः कोसलाश्र्च ये ।
चेदयश्रापरे वङ्गा मामेव समुपाश्रिताः ॥ ७ ॥
पृथिवी भूयसी तात मम पार्थस्य नो तथा ।