भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

१. नीलकण्ठी टीकामें अश्व-शास्त्रके अनुसार घोड़ोंके रंग और लक्षण आदिका परिचय दिया गया है। उसमेंसे कुछ आवश्यक बातें यहाँ यथास्थान उद्धृत की जाती हैं। सारंगका रंग सूचित करनेवाला रंग इस प्रकार है— सितनीलारुणो वर्णः सारंगसदृशश्च सः ।

२. कबूतरका रंग बतानेवाला वचन यों मिलता है— पारावतकपोताभः सितनीलसमन्वयात् ।

३. काम्बोज (काबुल)-के घोड़ोंका लक्षण— महाललाटजघनस्कन्धवक्षोजवा हयाः । दीर्घग्रीवायता ह्रस्वमुष्काः काम्बोजकाः स्मृताः ।। जिनके ललाट, जाँघें, कंधे, छाती और वेग महान् होते हैं, गर्दन लम्बी और चौड़ी होती है तथा अण्डकोष बहुत छोटे होते हैं, वे काबुली घोड़े माने गये हैं।

१. जिस घोड़ेके ललाटके मध्यभागमें ताराके समान श्वेत चिह्न हो, उसके उस चिह्नका नाम ललाम है। उससे युक्त अश्व भी ललाम ही कहलाता है। यथा— श्वेतं ललाटमध्यस्थं तारारूपं हयस्य यत् । ललामं चापि तत्प्राहुर्लामोऽश्वस्तदन्वितः ।।

३. 'हरि' का लक्षण इस प्रकार दिया गया है— सकेशराणि रोमाणि सुवर्णभानि यस्य तु । हरिः स वर्णतोऽश्वस्तु पीतकौशेयसंनिभः ।। जिसकी गर्दनके बड़े-बड़े बाल और शरीरके रोएँ सुनहरे रंगके हों, जो रंगमें रेशमी पीताम्बरके समान जान पड़ता हो, वह घोड़ा 'हरि' कहलाता है।

१. सिंधु देशके घोड़ोंकी गर्दन लम्बी, मूत्रेन्द्रिय मुँहतक पहुँचनेवाली, आँखे बड़ी-बड़ी, कद ऊँचा तथा रोएँ सूक्ष्म होते हैं। सिंधी घोड़े बड़े बलिष्ठ होते हैं, जैसा कि बताया गया है— दीर्घग्रीवा मुखालम्बमेहनाः पृथुलोचनाः । महान्तस्तनुरोमाणो बलिनः सैन्धवा हयाः ।।

३. पद्मवर्णका परिचय इस प्रकार दिया गया है— सितरक्तसमायोगात् पद्मवर्णः प्रकीर्त्यते । सफेद और लाल रंगोंके सम्मिश्रणसे जो रंग होता है, वह पद्मवर्ण कहलाता है।

३. बाह्लिक देशके घोड़े भी प्रायः काबुली घोड़ोंके समान ही होते हैं। उनमें विशेषता इतनी ही है कि उनका पीठभाग काम्बोजदेशीय घोड़ोंकी अपेक्षा बड़ा होता है। जैसा कि निम्नांकित वचनसे स्पष्ट है— काम्बोजसमसंस्थाना बाह्लिजाताश्च वाजिनः । विशेषः पुनरेतेषां दीर्घपृष्ठाङ्गतोच्यते ।।

४. जिनके रोएँ तथा केसर (गर्दनके बाल) सफेद होते हैं, त्वचा, गुह्यभाग, नेत्र, ओठ और खुर काले होते हैं, ऐसे घोड़ोंको महर्षियोंने क्रौंचवर्णका बताया है। यथा— सितलोमकेसराढ्याः कृष्णत्वग्गुह्यलोचनोष्ठखुराः । ये स्युर्मुनिर्भिर्वाहा निर्दिष्टाः क्रौञ्चवर्णास्ते ।।


* ये वसुदान २१।५५ में मारे गये वसुदानसे भिन्न हैं। इन्हें कहीं-कहीं 'काश्य' बताया गया है। सम्भाव है, ये ही काशिराज हों।
* यद्यपि सिंहसेन और व्याघ्रदत्तके मारे जानेका वर्णन (१६।३७ में) आ चुका है। तथापि यहाँ घोड़ोंके वर्णनके प्रसंगमें संजयने सामान्यतः सबके घोड़ोंका उल्लेख कर दिया है। मृत्युसे पहले वे दोनों वैसे ही घोड़ोंपर आरूढ़ हो रणभूमिमें पधारे थे।
* इन्हींका वर्णन पहले श्लोक ५६ में भी आ चुका है।