भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211

इति मामब्रवीत् सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा ॥ ८ ॥ सूत संजय! आजसे बहुत पहलेकी बात है, मूर्ख दुर्योधनने मुझसे कहा था कि 'पिताजी! इस समय केकय, काशी, कोसल तथा चेदिदेशके लोग मेरी सहायताके लिये आ गये हैं। दूसरे वंगवासियोंने भी मेरा ही आश्रय लिया है। तात! इस भूमण्डलका बहुत बड़ा भाग मेरे साथ है, अर्जुनके साथ नहीं है' ॥ ७-८ ॥ तस्य सेनासमूहस्य मध्ये द्रोणः सुरक्षितः । निहतः पार्षतेनाजौ किमन्यद् भागधेयतः ॥ ९ ॥ उसी विशाल सेनासमूहके मध्य सुरक्षित हुए द्रोणाचार्यको युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नने मार डाला, इसमें भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ९ ॥ मध्ये राज्ञां महाबाहुं सदा युद्धाभिनन्दिनम् । सर्वास्त्रपारगं द्रोणं कथं मृत्युरुपेयिवान् ॥ १० ॥ राजाओंके बीचमें सदा युद्धका अभिनन्दन करनेवाले सम्पूर्ण अस्त्र-विद्याके पारंगत विद्वान् महाबाहु द्रोणाचार्यको कैसे मृत्यु प्राप्त हुई? ॥ १० ॥ समनुप्राप्तकृच्छ्रोऽहं मोहं परममागतः । भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ११ ॥ मुझपर महान् संकट आ पहुँचा है। मेरी बुद्धिपर अत्यन्त मोह छा गया है। मैं भीष्म और द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर जीवित नहीं रह सकता ॥ ११ ॥ यन्मां क्षत्ताब्रवीत् तात प्रपश्यन् पुत्रगृद्धिनम् । दुर्योधनेन तत् सर्वं प्राप्तं सूत मया सह ॥ १२ ॥ तात! मुझे अपने पुत्रोंके प्रति अत्यन्त आसक्त देखकर विदुरने मुझसे जो कुछ कहा था, मेरे साथ दुर्योधनको वह सब प्राप्त हो रहा है ॥ १२ ॥ नृशंसं तु परं नु स्यात् त्यक्त्वा दुर्योधनं यदि । पुत्रशेषं चिकीर्षेयं कृत्स्नं न मरणं व्रजेत् ॥ १३ ॥ यदि मैं दुर्योधनको त्यागकर शेष पुत्रोंकी रक्षा करना चाहूँ तो यह अत्यन्त निष्ठुरताका कार्य अवश्य होगा, परंतु मेरे सारे पुत्रोंकी तथा अन्य सब लोगोंकी भी मृत्यु नहीं होगी ॥ १३ ॥ यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः । सोऽस्माच्च हीयते लोकात् क्षुद्रभावं च गच्छति ॥ १४ ॥ जो मनुष्य धर्मका परित्याग करके अर्थपरायण हो जाता है, वह इस लोकसे (लौकिक स्वार्थसे) भ्रष्ट हो जाता है और नीच गतिको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ अद्य चाप्यस्य राष्ट्रस्य हतोत्साहस्य संजय । अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ १५ ॥

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 211, कुल 3237 में से · BharatKosha