महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंजय! आज इस राष्ट्रका उत्साह भंग हो गया। प्रधानके मारे जानेसे अब मुझे किसीका जीवन शेष रहता नहीं दिखायी देता ॥ १५ ॥
कथं स्यादवशेषो हि धुर्ययोरभ्यतीतयोः ।
यौ नित्यमुपजीवामः क्षमिणौ पुरुषर्षभौ ॥ १६ ॥
हमलोग सदा जिन सर्वसमर्थ पुरुषसिंहोंका आश्रय लेकर जीवन धारण करते थे, उन धुरंधर वीरोंके इस लोकसे चले जानेपर अब हमारी सेनाका कोई भी सैनिक कैसे जीवित बच सकता है ॥ १६ ॥
व्यक्तमेव च मे शंस यथा युद्धमवर्तत ।
केऽयुध्यन् के व्यपाकुर्वन् के क्षुद्राः प्राद्रवन् भयात् ॥ १७ ॥
संजय! वह युद्ध जिस प्रकार हुआ था, सब साफ-साफ मुझसे बताओ। कौन-कौन वीर युद्ध करते थे, कौन किसको परास्त करते थे और कौन-कौन-से क्षुद्र सैनिक भयके कारण युद्धके मैदानसे भाग गये थे ॥
धनंजयं च मे शंस यद् यच्चक्रे रथर्षभः ।
तस्माद् भयं नो भूयिष्ठं भ्रातृव्याच्च वृकोदरात् ॥ १८ ॥
धनंजय अर्जुनके विषयमें भी मुझे बताओ। रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने क्या-क्या किया था। मुझे उनसे तथा शत्रुस्वरूप भीमसेनसे अधिक भय लगता है ॥ १८ ॥
यथाऽऽसीच्च निवृत्तेषु पाण्डवेयेषु संजय ।
मम सैन्यावशेषस्य संनिपातः सुदारुणः ॥ १९ ॥
संजय! पाण्डव-सैनिकोंके पुनः युद्धभूमिमें लौट आनेपर मेरी शेष सेनाके साथ जिस प्रकार उनका अत्यन्त भयंकर संग्राम हुआ था, वह कहो ॥ १९ ॥
कथं च वो मनस्तात निवृत्तेष्वभवत् तदा ।
मामकानां च ये शूराः के कांस्तत्र न्यवारयन् ॥ २० ॥
तात! पाण्डव-सैनिकोंके लौटनेपर तुमलोगोंके मनकी कैसी दशा हुई? मेरे पुत्रोंकी सेनामें जो शूरवीर थे, उनमेंसे किन लोगोंने शत्रुपक्षके किन वीरोंको रोका था? ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥