महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 215, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाण्डवश्रेष्ठ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको मद्रराज शल्यने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे क्षुब्ध महासागरको तटकी भूमि रोक देती है ॥ १५ ॥ तं धर्मराजो बहुभिर्मर्मभिद्भिर्वाकिरत् । मद्रेशस्तं चतुःषष्ट्या शरैर्विद्ध्वानदद् भृशम् ॥ १६ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने शल्यपर बहुत-से मर्मभेदी बाणोंकी वर्षा की। तब मद्रराज भी चौंसठ बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल करके जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १६ ॥ तस्य ननदतः केतुमुच्चकर्त च कार्मुकम् । क्षुराभ्यां पाण्डवो ज्येष्ठस्तत उच्चक्रुशुर्जनाः ॥ १७ ॥ तब ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरने दो क्षुरोंद्वारा गर्जना करते हुए राजा शल्यके ध्वज और धनुषको काट डाला। यह देख सब लोग हर्षसे कोलाहल कर उठे ॥ १७ ॥ तथैव राजा बाह्लीको राजानं द्रुपदं शरैः । आद्रवन्तं सहानीकः सहानीकं न्यवारयत् ॥ १८ ॥ इसी प्रकार अपनी सेनासहित राजा बाह्लीकने सैनिकोंके साथ धावा करते हुए राजा द्रुपदको अपने बाणोंद्वारा रोक दिया ॥ १८ ॥ तद् युद्धमभवद् घोरं वृद्धयोः सहसेनयोः । यथा महायूथपयोर्द्विपयोः सम्प्रभिन्नयोः ॥ १९ ॥ जैसे मदकी धारा बहानेवाले दो विशाल गजयूथपतियोंमें लड़ाई होती है, उसी प्रकार सेनासहित उन दोनों वृद्ध नरेशोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ विराटं मत्स्यमार्च्छताम् । सहसैन्यौ सहानीकं यथेन्द्राग्नी पुरा बलिम् ॥ २० ॥ अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दने अपनी सेनाओंको साथ लेकर विशाल वाहिनीसहित मत्स्यराज विराटपर उसी प्रकार धावा किया, जैसे पूर्वकालमें अग्नि और इन्द्रने राजा बलिपर आक्रमण किया था ॥ तदुत्पिञ्जलकं युद्धमासीद् देवासुरोपमम् । मत्स्यानां केकयैः सार्धमभीताश्वरथद्विपम् ॥ २१ ॥ उस समय मत्स्यदेशीय सैनिकोंका केकयदेशीय योद्धाओंके साथ देवासुर-संग्रामके समान अत्यन्त घमासान युद्ध हुआ। उसमें हाथी, घोड़े और रथ सभी निर्भय होकर एक-दूसरेसे लड़ रहे थे ॥ २१ ॥ नाकुलिं तु शतानीकं भूतकर्मा सभापतिः । अस्यन्तमिषुजालानि यान्तं द्रोणादवारयत् ॥ २२ ॥ नकुलका पुत्र शतानीक बाण-समूहोंकी वर्षा करता हुआ द्रोणाचार्यकी ओर बढ़ रहा था। उस समय भूतकर्मा सभापतिने उसे द्रोणकी ओर आनेसे रोक दिया ॥ ततो नकुलदायादस्तत्रिभिर्भल्लैः सुसंशितैः ।