भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

अपने स्वामी राजा दुर्योधनकी आज्ञा पाकर वे प्रहार करनेमें कुशल बुद्धिमान् शूरवीर राज्यको और मृत्युके भयको छोड़कर युद्धस्थलमें शत्रुओंका सामना करने लगे ।। ७ ।। कृतवर्मा शिनेः पौत्रं द्रोणं प्रेप्सुं विशाम्पते । पर्यवारयदायान्तं शूरं समरशोभिनम् ।। ८ ।। प्रजानाथ! द्रोणको अपने वशमें करनेकी इच्छासे आगे बढ़ते हुए संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर सात्यकिको कृतवर्माने रोक दिया ।। ८ ।। तं शैनेयः शरव्रातैः क्रुद्धः क्रुद्धमवारयत् । कृतवर्मा च शैनेयं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ।। ९ ।। तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने कुपित हुए कृतवर्माको अपने बाणसमूहोंद्वारा आगे बढ़नेसे रोका और कृतवर्माने सात्यकिको। ठीक उसी तरह, जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले गजराजको रोक देता है ।। सैन्धवः क्षत्रवर्माणमायान्तं निशितैः शरैः । उग्रधन्वा महेष्वासं यत्तो द्रोणादवारयत् ।। १० ।। भयंकर धनुष धारण करनेवाले सिंधुराज जयद्रथने महाधनुर्धर क्षत्रवर्माको अपने तीखे बाणोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक द्रोणाचार्यकी ओर आनेसे रोक दिया ।। १० ।। क्षत्रवर्मा सिन्धुपतेश्छित्त्वा केतनकार्मुके । नाराचैर्दशभिः क्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडयत् ।। ११ ।। क्षत्रवर्माने कुपित हो सिंधुराज जयद्रथके ध्वज और धनुष काटकर दस नाराचोंद्वारा उसके सभी मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचायी ।। ११ ।। अथान्यद् धनुरदाय सैन्धवः कृतहस्तवत् । विव्याध क्षत्रवर्माणं रणे सर्वायसैः शरैः ।। १२ ।। तब सिंधुराजने दूसरा धनुष लेकर सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति सम्पूर्णतः लोहेके बने हुए बाणोंद्वारा रणक्षेत्रमें क्षत्रवर्माको घायल कर दिया ।। १२ ।। युयुत्सुं पाण्डवार्थाय यतमानं महारथम् । सुबाहुर्भारतं शूरं यत्तो द्रोणादवारयत् ।। १३ ।। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके हितके लिये प्रयत्न करनेवाले भरतवंशी महारथी शूरवीर युयुत्सुको सुबाहुने प्रयत्नपूर्वक द्रोणाचार्यकी ओर आनेसे रोक दिया ।। सुबाहोः सधनुर्बाणावस्यतः परिघोपमौ । युयुत्सुः शितपीताभ्यां क्षुराभ्यामच्छिनद्भुजौ ।। १४ ।। तब युयुत्सुने प्रहार करते हुए सुबाहुकी परिघके समान मोटी एवं धनुष-बाणोंसे युक्त दोनों भुजाओंको अपने तीखे और पानीदार दो छुरोंद्वारा काट गिराया ।। राजानं पाण्डवश्रेष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । वेलेव सागरं क्षुब्धं मद्रराट् समवारयत् ।। १५ ।।