महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचक्रे विबाहुशिरसं भूतकर्माणमाहवे ॥ २३ ॥ तदनन्तर नकुलके पुत्रने तीन तीखे भल्लोंद्वारा युद्धमें भूतकर्माकी बाहु तथा मस्तक काट डाले ॥ २३ ॥ सुतसोमं तु विक्रान्तमायान्तं तं शरौघिणम् । द्रोणायाभिमुखं वीरं विविंशतिरवारयत् ॥ २४ ॥ पराक्रमी वीर सुतसोम बाण-समूहोंकी बौछार करता हुआ द्रोणाचार्यके सम्मुख आ रहा था। उसे विविंशतिने रोक दिया ॥ २४ ॥ सुतसोमस्तु संक्रुद्धः स्वपितृव्यमजिह्मगैः । विविंशतिं शरैर्भित्त्वा नाभ्यवर्तत दंशितः ॥ २५ ॥ तब सुतसोमने अत्यन्त कुपित हो अपने चाचा विविंशतिको सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा घायल कर दिया और स्वयं एक वीर पुरुषकी भाँति कवच बाँधे सामने खड़ा रहा ॥ २५ ॥ अथ भीमरथः शाल्वमाशुगैरायसैः शितैः । षड्भिः साश्वनियन्तारमनयद् यमसादनम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर भीमरथने छः तीखे लोहमय शीघ्रगामी बाणोंद्वारा सारथिसहित शाल्वको यमलोक पहुँचा दिया ।। श्रुतकर्माणमायान्तं मयूरसदृशैर्हयैः । चैत्रसेनिर्महाराज तव पौत्रं न्यवारयत् ॥ २७ ॥ महाराज! श्रुतकर्मा मोरके समान रंगवाले घोड़ोंपर आ रहा था। उस आपके पौत्र श्रुतकर्माको चित्रसेनके पुत्रने रोका ।। २७ ।। तौ पौत्रौ तव दुर्धर्षौ परस्परवधैषिणौ । पितॄणामर्थसिद्ध्यर्थं चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ॥ २८ ॥ आपके दोनों दुर्जय पौत्र एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखकर अपने पितृगणोंका मनोरथ सिद्ध करनेके लिये अच्छी तरह युद्ध करने लगे ।। २८ ।। तिष्ठन्तमग्रे तं दृष्ट्वा प्रतिविन्ध्यं महाहवे । द्रौणिर्मानं पितुः कुर्वन् मार्गणैः समवारयत् ॥ २९ ॥ उस महासमरमें प्रतिविन्ध्यको द्रोणाचार्यके सामने खड़ा देख पिताका सम्मान करते हुए अश्वत्थामाने बाणोंद्वारा रोक दिया ।। २९ ।। तं क्रुद्धं प्रतिविव्याध प्रतिविन्ध्यः शितैः शरैः । सिंहलाङ्गूललक्ष्माणं पितुरर्थे व्यवस्थितम् ॥ ३० ॥ जिसके ध्वजमें सिंहके पूँछका चिह्न था और जो पिताकी इष्ट सिद्धिके लिये खड़ा था, उस क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाको प्रतिविन्ध्यने अपने पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ।। ३० ।। प्रवपन्निव बीजानि बीजकाले नरर्षभ । द्रौणायनिर्द्रौपदेयं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३१ ॥