महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 217, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनरश्रेष्ठ! तब द्रोणपुत्र भी द्रौपदीकुमार प्रतिविन्ध्यपर बाणोंकी वर्षा करने लगा, मानो किसान बीज बोनेके समयपर खेतमें बीज डाल रहा हो ॥ ३१ ॥ आर्जुनिं श्रुतकीर्तिं तु द्रौपदेयं महारथम् । द्रोणायाभिमुखं यान्तं दौःशासनिरवारयत् ॥ ३२ ॥ तदनन्तर अर्जुनपुत्र द्रौपदीकुमार महारथी श्रुतकीर्तिको द्रोणाचार्यके सामने जाते देख दुःशासनके पुत्रने रोका ॥ तस्य कृष्णसमः कार्ष्णिस्त्रिभिर्भल्लैः सुसंशितैः । धनुर्ध्वजं च सूतं च छित्त्वा द्रोणान्तिकं ययौ ॥ ३३ ॥ तब अर्जुनके समान पराक्रमी अर्जुनकुमार तीन अत्यन्त तीखे भल्लोंद्वारा दुःशासनपुत्रके धनुष, ध्वज और सारथिके टुकड़े-टुकड़े करके द्रोणाचार्यके समीप जा पहुँचा ॥ ३३ ॥ यस्तु शूरतमो राजन्नुभयोः सेनयोर्मतः । तं पटच्चरहन्तारं लक्ष्मणः समवारयत् ॥ ३४ ॥ राजन्! जो दोनों सेनाओंमें सबसे अधिक शूरवीर माना जाता था, डाकू और लुटेरोंको मारनेवाले उस समुद्री प्रान्तोंके अधिपतिको दुर्योधनपुत्र लक्ष्मणने रोका ॥ स लक्ष्मणस्येष्वसनं छित्त्वा लक्ष्म च भारत । लक्ष्मणे शरजालानि विसृजन् बह्वशोभत ॥ ३५ ॥ भारत! तब वह लक्ष्मणके धनुष और ध्वजचिह्नको काटकर उसके ऊपर बाण-समूहोंकी वर्षा करता हुआ बहुत शोभा पाने लगा ॥ ३५ ॥ विकर्णस्तु महाप्राज्ञो याज्ञसेनिं शिखण्डिनम् । पर्यवारयदायान्तं युवानं समरे युवा ॥ ३६ ॥ परम बुद्धिमान् नवयुवक विकर्णने युवावस्थासे सम्पन्न द्रुपदकुमार शिखण्डीको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोका ॥ ततस्तमिषुजालेन याज्ञसेनिः समावृणोत् । विधूय तद् बाणजालं बभौ तव सुतो बली ॥ ३७ ॥ तब शिखण्डीने अपने बाण-समूहसे विकर्णको आच्छादित कर दिया। आपका बलवान् पुत्र उस सायक-जालको छिन्न-भिन्न करके बड़ी शोभा पाने लगा ॥ ३७ ॥ अङ्गदोऽभिमुखं वीरमुत्तमौजसमाहवे । द्रोणायाभिमुखं यान्तं शरौघेन न्यवारयत् ॥ ३८ ॥ अंगदने वीर उत्तमौजाको अपने और द्रोणाचार्यके सामने आते देख युद्धस्थलमें अपने बाणसमुदायकी वर्षासे रोक दिया ॥ ३८ ॥ स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोः पुरुषसिंहयोः । सैनिकानां च सर्वेषां तयोश्च प्रीतिवर्धनः ॥ ३९ ॥