महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन दोनों पुरुषसिंहोंमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। वह संग्राम समस्त सैनिकोंकी तथा उन दोनोंकी भी प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ ३९ ॥
दुर्मुखस्तु महेष्वासो वीरं पुरुजितं बली ।
द्रोणायाभिमुखं यान्तं वत्सदन्तैरवारयत् ॥ ४० ॥
महाधनुर्धर बलवान् दुर्मुखने द्रोणाचार्यके सामने जाते हुए वीर पुरुजित्को वत्सदन्तोंके प्रहारद्वारा रोक दिया ॥ ४० ॥
स दुर्मुखं भ्रुवोर्मध्ये नाराचेनाभ्यताडयत् ।
तस्य तद् विभभौ वक्त्रं सनालमिव पङ्कजम् ॥ ४१ ॥
तब पुरुजित्ने एक नाराचद्वारा दुर्मुखपर उसकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें प्रहार किया। उस समय दुर्मुखका मुख मृणालयुक्त कमलके समान सुशोभित हुआ ॥ ४१ ॥
कर्णस्तु केकयान् भ्रातॄन् पञ्च लोहितकध्वजान् ।
द्रोणायाभिमुखं यातान् शरवर्षैरवारयत् ॥ ४२ ॥
कर्णने लाल रंगकी ध्वजासे सुशोभित पाँचों भाई केकयराजकुमारोंको द्रोणाचार्यके सम्मुख जाते देख उन्हें बाणोंकी वर्षासे रोक दिया ॥ ४२ ॥
ते चैनं भृशसंतप्ताः शरवर्षैरवाकिरन् ।
स च तांश्छादयामास शरजालैः पुनः पुनः ॥ ४३ ॥
तब वे अत्यन्त संतप्त हो कर्णपर बाणोंकी झड़ी लगाने लगे और कर्णने भी अपने बाणोंके समूहसे उन्हें बार-बार आच्छादित कर दिया ॥ ४३ ॥
नैव कर्णो न ते पञ्च ददृशुर्बाणसंवृताः ।
साश्वसूतध्वजरथाः परस्परशराचिताः ॥ ४४ ॥
कर्ण तथा वे पाँचों राजकुमार एक-दूसरेके बरसाये हुए बाण-समूहोंसे व्याप्त एवं आच्छादित होकर घोड़े, सारथि, ध्वज तथा रथसहित अदृश्य हो गये थे ॥ ४४ ॥
पुत्रास्ते दुर्जयश्चैव जयश्च विजयश्च ह ।
नीलकाश्यजयत्सेनांस्त्रयस्त्रीन् प्रत्यवारयन् ॥ ४५ ॥
राजन्! आपके तीन पुत्र दुर्जय, जय और विजयने नील, काश्य तथा जयत्सेन—इन तीनोंको रोक दिया ॥
तद् युद्धमभवद् घोरमीक्षितृप्रीतिवर्धनम् ।
सिंहव्याघ्रतरक्षूणां यथर्क्षमहिषर्षभैः ॥ ४६ ॥
उन सबमें भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो सिंह, व्याघ्र और तेंदुओं (जखों)-का रीछों, भैंसों तथा साँड़ोंके साथ होनेवाले युद्धके समान दर्शकोंके हर्षको बढ़ानेवाला था ॥ ४६ ॥
क्षेमधूर्तिर्बृहन्तौ तु भ्रातरौ सात्वतं युधि ।
द्रोणायाभिमुखं यान्तं शरैस्तीक्ष्णैस्ततक्षतुः ॥ ४७ ॥