भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

क्षेमधूर्ति और बृहन्त—ये दोनों भाई युद्धमें द्रोणाचार्यके सामने जाते हुए सात्यकिको अपने पैने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ४७ ॥ तयोस्तस्य च तद् युद्धमत्यद्भुतमिवाभवत् । सिंहस्य द्विपमुख्याभ्यां प्रभिन्नाभ्यां यथा वने ॥ ४८ ॥ जैसे वनमें दो मदस्रावी गजराजोंके साथ एक सिंहका युद्ध हो रहा हो, उसी प्रकार उन दोनों भाइयों तथा सात्यकिका युद्ध अत्यन्त अद्भुत-सा हो रहा था ॥ ४८ ॥ राजानं तु तथम्बष्ठमेकं युद्धाभिनन्दिनम् । चेदिराजः शरानस्यन् क्रुद्धो द्रोणादवारयत् ॥ ४९ ॥ युद्धका अभिनन्दन करनेवाले राजा अम्बष्ठको क्रोधमें भरे हुए चेदिराजने बाणोंकी वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यके पास आनेसे रोक दिया ॥ ४९ ॥ ततोऽम्बष्ठोऽस्थिभेदिन्या निरभिद्यच्छलाकया । स त्यक्त्वा सशरं चापं रथाद् भूमिमुपागमत् ॥ ५० ॥ तब अम्बष्ठने हड्डियोंको छेद देनेवाली शलाकाद्वारा चेदिराजको विदीर्ण कर दिया। वे बाणसहित धनुषको त्यागकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५० ॥ वार्धक्षेमिं तु वार्ष्णेयं कृपः शारद्वतः शरैः । अक्षुद्रः क्षुद्रकैर्द्रोणात् क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ५१ ॥ शरद्वान्‌के पुत्र श्रेष्ठ कृपाचार्यने क्रोधमें भरे हुए वृष्णिवंशी वार्धक्षेमिको अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यके पास आनेसे रोका ॥ ५१ ॥ युध्यन्तौ कृपवार्ष्णेयौ येऽपश्यंश्चित्रयोधिनौ । ते युद्धासक्तमनसो नान्यां बुबुधिरे क्रियाम् ॥ ५२ ॥ कृपाचार्य और वृष्णिवंशी वीर वार्धक्षेमि विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे। जिन लोगोंने उन दोनोंको युद्ध करते देखा, उनका मन उसीमें आसक्त हो गया। उन्हें दूसरी किसी क्रियाका भान नहीं रहा ॥ ५२ ॥ सौमदत्तिस्तु राजानं मणिमन्तमतन्द्रितम् । पर्यवारयदायान्तं यशो द्रोणस्य वर्धयन् ॥ ५३ ॥ सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाने द्रोणाचार्यका यश बढ़ाते हुए उनपर आक्रमण करनेवाले आलस्यरहित राजा मणिमान्‌को रोक दिया ॥ ५३ ॥ स सौमदत्तेस्त्वरितश्चित्रेष्वसनकेतने । पुनः पताकां सूतं च छत्रं चापातयद् रथात् ॥ ५४ ॥ तब उन्होंने तुरंत ही शूरिश्रवाके विचित्र धनुष, ध्वजा-पताका, सारथि और छत्रको रथसे काट गिराया ॥ ५४ ॥ अथाप्लुत्य रथात् तूर्णं यूपकेतुरमित्रहा । साश्वसूतध्वजरथं तं चकर्त वरासिना ॥ ५५ ॥