भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

यह देख यूपके चिह्नसे सुशोभित ध्वजवाले शत्रुसूदन भूरिश्रवाने तुरंत ही रथसे कूदकर लंबी तलवारसे घोड़े, सारथि, ध्वज एवं रथसहित राजा मणिमान्‌को काट डाला ॥ ५५ ॥
रथं च स्वं समास्थाय धनुरादाय चापरम् ।
स्वयं यच्छन् हयान् राजन् व्यधमत् पाण्डवीं चमूम् ॥ ५६ ॥
राजन्! तत्पश्चात् भूरिश्रवा अपने रथपर बैठकर स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें रखता हुआ दूसरा धनुष हाथमें ले पाण्डव-सेनाका संहार करने लगा ॥ ५६ ॥
पाण्ड्यमिन्द्रमिवायान्तमसुरान् प्रति दुर्जयम् ।
समर्थः सायकौघेन वृषसेनो न्यवारयत् ॥ ५७ ॥
जैसे इन्द्र असुरोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यपर धावा करनेवाले दुर्जय वीर पाण्ड्यको शक्तिशाली वीर वृषसेनने अपने सायकसमूहसे रोक दिया ॥ ५७ ॥
गदापरिघनिस्त्रिंशपट्टिशायोधनोपलैः ।
कडङ्गरैर्भुशुण्डीभिः प्रासैस्तोमरसायकैः ॥ ५८ ॥
मुसलैर्मुद्गरैश्चक्रैर्भिन्दिपालपरश्वधैः ।
पांसुवाताग्निसलिलैर्भस्मलोष्टतृणद्रुमैः ॥ ५९ ॥
आतुदन् प्ररुजन् भञ्जन् निघ्नन् विद्रावयन् क्षिपन् ।
सेनां विभीषयन्नायाद् द्रौणप्रेप्सुर्घटोत्कचः ॥ ६० ॥
तत्पश्चात् गदा, परिघ, खड्ग, पट्टिश, लोहेके घन, पत्थर, कडंगर, भुशुण्डि, प्रास, तोमर, सायक, मुसल, मुद्गर, चक्र, भिन्दिपाल, फरसा, धूल, हवा, अग्नि, जल, भस्म, मिट्टीके ढेले, तिनके तथा वृक्षोंसे कौरव-सेनाको पीड़ा देता, शत्रुओंका अंग-भंग करता, तोड़ता-फोड़ता, मारता-भगाता, फेंकता एवं सारी सेनाको भयभीत करता हुआ घटोत्कच वहाँ द्रोणाचार्यको पकड़नेके लिये आया ॥ ५८—६० ॥
तं तु नानाप्रहरणैर्नानायुद्धविशेषणैः ।
राक्षसं राक्षसः क्रुद्धः समाजघ्ने ह्यलम्बुषः ॥ ६१ ॥
उस समय उस राक्षसको क्रोधमें भरे हुए अलम्बुष नामक राक्षसने ही अनेकानेक युद्धोंमें उपयोगी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥
तयोस्तदभवद् युद्धं रक्षोग्रामणिमुख्ययोः ।
तादृग् यादृक् पुरावृत्तं शम्बरामरराज्ययोः ॥ ६२ ॥
उन दोनों श्रेष्ठ राक्षसयूथपतियोंमें वैसा ही युद्ध हुआ, जैसा कि पूर्वकालमें शम्बरासुर तथा देवराज इन्द्रमें हुआ था ॥ ६२ ॥
(भारद्वाजस्तु सेनान्यं धृष्टद्युम्नं महारथम् ।
तमेव राजन्नायान्तमतिक्रम्य परान् रिपून् ॥
महता शरजालेन किरन्तं शत्रुवाहिनीम् ।
अवारयन्महाराज सामात्यं सपदानुगम् ॥