महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 221, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यने देखा कि पाण्डव-सेनापति महारथी धृष्टद्युम्न दूसरे शत्रुओंको लाँघकर अपने मन्त्रियों तथा सेवकोंसहित मेरी ही ओर आ रहा है और शत्रुसेनापर बाणोंका भारी जाल-सा बिखेर रहा है, तब उन्होंने स्वयं आगे बढ़कर उसे रोका।
अथान्ये पार्थिवा राजन् बहुत्वान्नातिकीर्तिताः ।
समसज्जन्त सर्वे ते यथायोगं यथाबलम् ॥
राजन्! इसी प्रकार अन्य सब राजा भी अपने बल और साधनोंके अनुसार शत्रुओंके साथ भिड़ गये। उनकी संख्या बहुत होनेके कारण सबके नामोंका उल्लेख नहीं किया गया है।
हयैर्हयांस्तथा जग्मुः कुञ्जरैरेव कुञ्जराः ।
पदातयः पदातीभी रथैरेव महारथाः ॥
अकुर्वन्नार्यकर्माणि तत्रैव पुरुषर्षभाः ।
कुलवीर्यानुरूपाणि संसृष्टाश्च परस्परम् ॥)
घोड़ोंसे घोड़े, हाथियोंसे हाथी, पैदलोंसे पैदल तथा बड़े-बड़े रथोंसे महान् रथ जूझ रहे थे। उस युद्धमें पुरुष-शिरोमणि वीर अपने कुल और पराक्रमके अनुरूप एक-दूसरेसे भिड़कर आर्यजनोचित कर्म कर रहे थे।
एवं द्वन्द्वशतान्यासन् रथवारणवाजिनाम् ।
पदातीनां च भद्रं ते तव तेषां च संकुले ॥ ६३ ॥
महाराज! आपका कल्याण हो। इस प्रकार आपके और पाण्डवोंके उस भयंकर संग्राममें रथ, हाथी, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके सैकड़ों द्वन्द्व आपसमें युद्ध कर रहे थे ॥ ६३ ॥
नैतादृशो दृष्टपूर्वः संग्रामो नैव च श्रुतः ।
द्रोणस्याभावभावे तु प्रसक्तानां यथाभवत् ॥ ६४ ॥
द्रोणाचार्यके वध और संरक्षणमें लगे हुए पाण्डव तथा कौरव-सैनिकोंमें जैसा संग्राम हुआ था, ऐसा पहले कभी न तो देखा गया है और न सुना ही गया है ॥ ६४ ॥
इदं घोरमिदं चित्रमिदं रौद्रमिति प्रभो ।
तत्र युद्धान्यदृश्यन्त प्रततानि बहूनि च ॥ ६५ ॥
प्रभो! वहाँ भिन्न-भिन्न दलोंमें बहुत-से विस्तृत युद्ध दृष्टिगोचर हो रहे थे, जिन्हें देखकर दर्शक कहते थे 'यह घोर युद्ध हो रहा है, यह विचित्र संग्राम दिखायी देता है और यह अत्यन्त भयंकर मारकाट हो रही है' ॥ ६५ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्वन्द्वयुद्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥