भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

धनञ्जयने शत्रुओंको शरीरके अनेक अंगोंसे विहीन कर दिया। किन्हींकी पीठ काट ली तो किन्हींके पैर उड़ा दिये। कितने ही सैनिक बाहु, पसली और नेत्रोंसे वंचित होकर व्याकुल हो रहे थे ॥ २७ ॥ गन्धर्वनगराकारान् विधिवत्कल्पितान् रथान् । शरैर्विशकलीकुर्वंश्चक्रे व्यश्वरथद्विपान् ॥ २८ ॥ उन्होंने गन्धर्वनगरोंके समान प्रतीत होनेवाले और विधिवत् सजे हुए रथोंके अपने बाणोंद्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिये और शत्रुओंको हाथी, घोड़े एवं रथोंसे वंचित कर दिये ॥ २८ ॥ मुण्डतालवनानीव तत्र तत्र चकाशिरे । छिन्ना रथध्वजव्राताः केचित्तत्र क्वचित् क्वचित् ॥ २९ ॥ वहाँ कहीं-कहीं रथवर्ती ध्वजोंके समूह ऊपरसे कट जानेके कारण मुण्डित तालवनोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २९ ॥ सोत्तरायुधिनो नागाः सपताकाङ्कुशध्वजाः । पेतुः शक्राशनिहता द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ ३० ॥ पताका, अंकुश और ध्वजोंसे विभूषित गजराज वहाँ इन्द्रके वज्रसे मारे हुए वृक्षयुक्त पर्वतोंके समान ऊपर चढ़े हुए योद्धाओंसहित धराशायी हो गये ॥ ३० ॥ चामरापीडकवचाः सस्त्रान्त्रनयनास्तथा । सारोहास्तुरगाः पेतुः पार्थबाणहताः क्षितौ ॥ ३१ ॥ चामर, माला और कवचोंसे युक्त बहुत-से घोड़े अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर सवारोंसहित धरतीपर पड़े थे। उनकी आँतें और आँखें बाहर निकल आयी थीं ॥ ३१ ॥ विप्रविद्धासिनखराश्छिन्नवर्मर्ष्टिशक्तयः । पत्त्यश्छिन्नवर्माणः कृपणाः शेरते हताः ॥ ३२ ॥ पैदल सैनिकोंके खड्ग एवं नखर कटकर गिरे हुए थे। कवच, ऋष्टि और शक्तियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। कवच कट जानेसे अत्यन्त दीन हो वे मरकर पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ३२ ॥ तैर्हतैर्हन्यमानैश्च पतद्भिः पतितैरपि । भ्रमद्भिर्निघ्नद्भिश्च क्रूरमायोधनं बभौ ॥ ३३ ॥ कितने ही वीर मारे गये थे और कितने ही मारे जा रहे थे। कुछ गिर गये थे और कुछ गिर रहे थे। कितने ही चक्कर काटते और आघात करते थे। इन सबके द्वारा वह युद्धस्थल अत्यन्त क्रूरतापूर्ण जान पड़ता था ॥ ३३ ॥ रजश्च सुमहज्जातं शान्तं रुधिरवृष्टिभिः । मही चाप्यभवद् दुर्गा कबन्धशतसंकुला ॥ ३४ ॥