महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् उस दिव्यास्त्रने संशप्तकोंके छोड़े हुए सहस्रों बाणोंको भस्म करके बहुसंख्यक वीरोंको यमलोक पहुँचा दिया॥ १५॥
अथ प्रहस्य बीभत्सुर्ललित्थान् मालवानपि ।
मावेल्लकांस्त्रिगर्तांश्च यौधेयांश्चार्दयच्छरैः ॥ १६ ॥
इसके बाद अर्जुनने हँसकर ललित्थ, मालव, मावेल्लक, त्रिगर्त तथा यौधेय सैनिकोंको बाणोंद्वारा गहरी पीड़ा पहुँचायी॥ १६॥
ते हन्यमाना वीरेण क्षत्रियाः कालचोदिताः ।
व्यसृजञ्छरजालानि पार्थे नानाविधानि च ॥ १७ ॥
वीर अर्जुनके द्वारा मारे जाते हुए क्षत्रियगण कालसे प्रेरित हो अर्जुनके ऊपर नाना प्रकारके बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे॥ १७॥
न ध्वजो नार्जुनस्तत्र न रथो न च केशवः ।
प्रत्यदृश्यत घोरेण शरवर्षेण संवृतः ॥ १८ ॥
उस भयंकर बाण-वर्षासे ढक जानेके कारण वहाँ न ध्वज दिखायी देता था, न रथ; न अर्जुन दृष्टिगोचर हो रहे थे, न भगवान् श्रीकृष्ण॥ १८॥
ततस्ते लब्धलक्षत्वादन्योन्यमभिचुक्रुशुः ।
हतौ कृष्णाविति प्रीत्या वासांस्यादुधुवुस्तदा ॥ १९ ॥
उस समय 'हमने अपने लक्ष्यको मार लिया' ऐसा समझकर वे एक-दूसरेकी ओर देखते हुए चोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन मारे गये—ऐसा सोचकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने कपड़े हिलाने लगे॥ १९॥
भेरीमृदङ्गशङ्खांश्च दध्मुर्वीराः सहस्रशः ।
सिंहनादरवांश्चोग्रांश्चक्रिरे तत्र मारिष ॥ २० ॥
आर्य! वे सहस्रों वीर वहाँ भेरी, मृदंग और शंख बजाने तथा भयानक सिंहनाद करने लगे॥ २०॥
ततः प्रसिष्विदे कृष्णः खिन्नश्चार्जुनमब्रवीत् ।
क्वासि पार्थ न पश्ये त्वां कच्चिज्जीवसि शत्रुहन् ॥ २१ ॥
उस समय श्रीकृष्ण पसीने-पसीने हो गये और खिन्न होकर अर्जुनसे बोले—'पार्थ! कहाँ हो। मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ। शत्रुओंका नाश करनेवाले वीर! क्या तुम जीवित हो?'॥ २१॥
तस्य तद् भाषितं श्रुत्वा त्वरमाणो धनंजयः ।
वायव्यास्त्रेण तैरस्तां शरवृष्टिमपाहरत् ॥ २२ ॥
श्रीकृष्णका वह वचन सुनकर अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ वायव्यास्त्रका प्रयोग करके शत्रुओंद्वारा की हुई उस बाण-वर्षाको नष्ट कर दिया॥ २२॥
ततः संशप्तकव्रातान् साश्वद्विपरथायुधान् ।