भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

तब क्रोधमें भरे हुए नारायणीसेनाके गोपोंने हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर अर्जुनको अपने बाण-समूहोंसे आच्छादित करते हुए उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ।। अदृश्यं च मुहूर्तेन चक्रुस्ते भरतर्षभ ।
कृष्णेन सहितं युद्धे कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।। ८ ।।
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने दो ही घड़ीमें श्रीकृष्णसहित कुन्तीकुमार अर्जुनको युद्धमें अदृश्य कर दिया ।। ८ ।।
क्रुद्धस्तु फाल्गुनः संख्ये द्विगुणीकृतविक्रमः ।
गाण्डीवं धनुरामृज्य तूर्णं जग्राह संयुगे ।। ९ ।।
तब अर्जुनने कुपित होकर युद्धमें अपना द्विगुण पराक्रम प्रकट करते हुए गाण्डीव धनुषको सब ओरसे पोंछकर उसे तुरंत हाथमें लिया ।। ९ ।।
बद्ध्वा च भ्रुकुटिं वक्रे क्रोधस्य प्रतिलक्षणम् ।
देवदत्तं महाशङ्खं पूरयामास पाण्डवः ।। १० ।।
फिर पाण्डुकुमारने भौंहें टेढ़ी करके क्रोधको सूचित करनेवाले अपने महान् शंख देवदत्तको बजाया ।।
अथास्त्रमरिसंघघ्नं त्वाष्ट्रमभ्यस्यदर्जुनः ।
ततो रूपसहस्राणि प्रादुरासन् पृथक् पृथक् ।। ११ ।।
तदनन्तर अर्जुनने शत्रुसमूहोंका नाश करनेवाले त्वाष्ट्र नामक अस्त्रका प्रयोग किया। फिर तो उस अस्त्रसे सहस्रों रूप पृथक्-पृथक् प्रकट होने लगे ।। ११ ।।
आत्मनः प्रतिरूपैस्तैर्नानारूपैर्विमोहिताः ।
अन्योन्येनार्जुनं मत्वा स्वमात्मानं च जघ्निरे ।। १२ ।।
अपने ही समान आकृतिवाले उन नाना रूपोंसे मोहित हो वे एक-दूसरेको अर्जुन मानकर अपने तथा अपने ही सैनिकोंपर प्रहार करने लगे ।। १२ ।।
अयमर्जुनोऽयं गोविन्द इमौ पाण्डवयादवौ ।
इति ब्रुवाणाः सम्मूढा जघ्नुरन्योन्यमाहवे ।। १३ ।।
ये अर्जुन हैं, ये श्रीकृष्ण हैं, ये दोनों अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं—इस प्रकार बोलते हुए वे मोहाच्छन्न हो युद्धमें एक-दूसरेपर आघात करने लगे ।। १३ ।।
मोहिताः परमास्त्रेण क्षयं जग्मुः परस्परम् ।
अशोभन्त रणे योधाः पुष्पिता इव किंशुकाः ।। १४ ।।
उस दिव्यास्त्रसे मोहित हो वे परस्परके आघातसे क्षीण होने लगे। उस रणक्षेत्रमें समस्त योद्धा फूले हुए पलाश वृक्षके समान शोभा पा रहे थे ।। १४ ।।
ततः शरसहस्राणि तैर्विमुक्तानि भस्मसात् ।
कृत्वा तदस्त्रं तान् वीराननयद् यमसादनम् ।। १५ ।।