भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1539, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1539

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः

अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना

संजय उवाच

तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
न्यवारयदमेयात्मा द्रोणपुत्रजयेप्सया ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर अमेय आत्मबल-से सम्पन्न कुन्तीकुमार अर्जुनने सेनाको भागती देख द्रोणपुत्रपर विजय पानेकी इच्छासे उसे रोका ॥ १ ॥

ततस्ते सैनिका राजन् नैव तत्रावतस्थिरे ।
संस्थाप्यमाना यत्नेन गोविन्देनार्जुनेन च ॥ २ ॥
नरेश्वर! श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा प्रयत्नपूर्वक ठहराये जानेपर भी वे सैनिक वहाँ खड़े न हो सके ॥ २ ॥

एक एव च बीभत्सुः सोमकावयवैः सह ।
मत्स्यैरन्यैश्च संधाय कौरवान् संन्यवर्तत ॥ ३ ॥
अकेले अर्जुन ही सोमकोंकी टुकड़ियों, मत्स्यदेशीय योद्धाओं तथा अन्य लोगोंको साथ लेकर कौरवोंका सामना करनेके लिये लौटे ॥ ३ ॥

ततो द्रुतमतिक्रम्य सिंहलाङ्गूलकेतनम् ।
सव्यसाची महेष्वासमश्वत्थामानमब्रवीत् ॥ ४ ॥
सव्यसाची अर्जुन सिंहकी पूँछके चिह्नवाली ध्वजासे युक्त महाधनुर्धर अश्वत्थामाके पास तुरंत आकर उससे इस प्रकार बोले— ॥ ४ ॥

या शक्तिर्यच्च विज्ञानं यद् वीर्यं यच्च पौरुषम् ।
धार्तराष्ट्रेषु या प्रीतिर्द्वेषोऽस्मासु च यश्च ते ॥ ५ ॥
यच्च भूयोऽस्ति तेजस्ते तत् सर्वं मयि दर्शय ।
स एव द्रोणहन्ता ते दर्पं छेत्स्यति पार्षतः ॥ ६ ॥
‘आचार्यपुत्र! तुममें जो शक्ति, जो विज्ञान, जो बल-पराक्रम, जो पुरुषार्थ, कौरवोंपर जो प्रेम तथा हमलोगोंपर जो तुम्हारा द्वेष हो, साथ ही तुममें जो तेज और प्रभाव हो, वह सब मुझपर दिखाओ। द्रोणाचार्यका वध करनेवाला वह धृष्टद्युम्न ही तुम्हारा सारा घमंड चूर कर देगा ॥ ५-६ ॥