महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1542, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउल्काश्च गगनात् पेतुर्दिशश्च न चकाशिरे । तमश्च सहसा रौद्रं चमूमवततार ताम् ॥ १९ ॥ आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, दिशाओंका प्रकाश लुप्त हो गया और उस सेनामें सहसा भयानक अन्धकार उतर आया ॥ १९ ॥ रक्षांसि च पिशाचाश्च विनेदुरतिसङ्गताः । ववुश्चाशिशिरा वाताः सूर्यो नैव तताप च ॥ २० ॥ राक्षस और पिशाच परस्पर मिलकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे, गरम हवा चलने लगी और सूर्यका ताप क्षीण हो गया ॥ २० ॥ वायसाश्चापि चाक्रन्दन् दिक्षु सर्वासु भैरवम् । रुधिरं चापि वर्षन्तो विनेदुस्तोयदा दिवि ॥ २१ ॥ कौए सम्पूर्ण दिशाओंमें काँव-काँव करके भयानक कोलाहल मचाने लगे तथा मेघ रक्तकी वर्षा करते हुए आकाशमें गरजने लगे ॥ २१ ॥ पक्षिणः पशवो गावो विनेदुश्चापि सुव्रताः । परमं प्रयतात्मानो न शान्तिमुपलेभिरे ॥ २२ ॥