महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1549, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतावक्षतौ प्रमुदितौ दध्यतुर्वारिजोत्तमौ । दृष्ट्वा प्रमुदितान् पार्थांस्त्वदीया व्यथिता भृशम् ॥ ४४ ॥ उन दोनोंके शरीरमें क्षति नहीं पहुँची थी। वे दोनों वीर आनन्दमग्न हो अपने उत्तम शंख बजाने लगे। कुन्तीके पुत्रोंको प्रसन्न देखकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४४ ॥
विमुक्तौ च महात्मानौ दृष्ट्वा द्रौणिः सुदुःखितः । मुहूर्तं चिन्तयामास किं त्वेतदिति मारिष ॥ ४५ ॥ माननीय नरेश! महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनको आग्नेयास्त्रसे मुक्त देख अश्वत्थामाको बड़ा दुःख हुआ। वह दो घड़ीतक इसी चिन्तामें डूबा रहा कि ‘यह क्या हो गया?’ ॥ ४५ ॥
चिन्तयित्वा तु राजेन्द्र ध्यानशोकपरायणः । निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च विमनाश्चाभवत् ततः ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! चिन्ता और शोकमें मग्न होकर कुछ देरतक विचार करनेके पश्चात् अश्वत्थामा गरम-गरम दीर्घ उच्छ्वास लेने लगा और मन-ही-मन उदास हो गया ॥
ततो द्रौणिर्धनुस्त्यक्त्वा रथात् प्रस्कन्द्य वेगितः । धिग् धिक् सर्वमिदं मिथ्येत्युक्त्वा सम्प्राद्रवद् रणात् ॥ ४७ ॥ तत्पश्चात् द्रोणकुमार धनुष त्यागकर रथसे कूद पड़ा और ‘धिक्कार है! धिक्कार है!! यह सब मिथ्या है’ ऐसा कहकर वह रणभूमिसे वेगपूर्वक भाग चला ॥
ततः स्निग्धाम्बुदाभासं वेदावासमकल्मषम् । वेदव्यासं सरस्वत्यावासं व्यासं ददर्श ह ॥ ४८ ॥ इतनेमेंही उसे स्निग्ध मेघके समान श्याम कान्तिवाले, वेद और सरस्वतीके आवास-स्थान तथा वेदोंका विस्तार करनेवाले, पापशून्य महर्षि व्यास वहाँ दिखायी दिये ॥ ४८ ॥
तं द्रौणिरग्रतो दृष्ट्वा स्थितं कुरुकुलोद्वह । सन्नकण्ठोऽब्रवीद् वाक्यमभिवाद्य सुदीनवत् ॥ ४९ ॥ कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष! महर्षि व्यासको सामने खड़ा देख द्रोणकुमारका गला आँसुओंसे भर आया। उसने अत्यन्त दीनभावसे प्रणाम करके उनसे इस प्रकार पूछा — ॥ ४९ ॥