महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभो भो माया यदृच्छा वा न विद्मः किमिदं भवेत् । अस्त्रं त्विदं कथं मिथ्या मम कश्च व्यतिक्रमः ॥ ५० ॥ 'महर्षे! यह माया है या दैवेच्छा। मेरी समझमें नहीं आता कि यह क्या है? यह अस्त्र झूठा कैसे हो गया? मुझसे कौन-सी गलती हो गयी? ।। ५० ।।
अधरोत्तरमेतद् वा लोकानां वा पराभवः । यदिमौ जीवतः कृष्णौ कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ५१ ॥ 'इस (आग्नेय) अस्त्रके प्रभावमें कोई उलट-फेर तो नहीं हो गया अथवा सम्पूर्ण लोकोंका पराभव होनेवाला है, जिससे ये दोनों कृष्ण जीवित बच गये। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है ।। ५१ ।।
नासुरा न च गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । न सर्पा यक्षपतगा न मनुष्याः कथंचन ॥ ५२ ॥ उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मयेरितम् । तदिदं केवलं हत्वा शान्तमक्षौहिणीं ज्वलत् ॥ ५३ ॥ 'मेरे द्वारा प्रयोग किये हुए इस अस्त्रको असुर, गन्धर्व, पिशाच, राक्षस, सर्प, यक्ष, पक्षी और मनुष्य किसी तरह भी व्यर्थ नहीं कर सकते थे, तो भी यह प्रज्वलित अस्त्र केवल एक