भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1551

अक्षौहिणी सेनाको जलाकर शान्त हो गया ।। ५२-५३ ।। सर्वघाति मया मुक्तमस्त्रं परमदारुणम् । केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत् केशवार्जुनौ ।। ५४ ।। 'मैंने तो अत्यन्त भयंकर एवं सर्वसंहारक अस्त्रका प्रयोग किया था; फिर उसने किस कारणसे इन मर्त्यधर्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध नहीं किया? ।। एतत् प्रब्रूहि भगवन् मया पृष्टो यथातथम् । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सर्वमेतन्महामुने ।। ५५ ।। 'भगवन्! महामुने! मैंने जो आपसे यह प्रश्न किया है, इसका मुझे यथार्थ उत्तर दीजिये। मैं यह सब कुछ ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ' ।। ५५ ।।

व्यास उवाच

महान्तमेवमथ मां यं त्वं पृच्छसि विस्मयात् । तं प्रवक्ष्यामि ते सर्वं समाधाय मनः शृणु ।। ५६ ।। **व्यासजी बोले—**तू जिसके सम्बन्धमें आश्चर्यके साथ प्रश्न कर रहा है, उस महत्त्वपूर्ण विषयको मैं तुझसे बता रहा हूँ। तू अपने मनको एकाग्र करके सब कुछ सुन ।। योऽसौ नारायणो नाम पूर्वेषामपि पूर्वजः । (आदिदेवो जगन्नाथो लोककर्ता स्वयं प्रभुः । आद्यः सर्वस्य लोकस्य अनादिनिधनोऽच्युतः ।। जो हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज भगवान् नारायण हैं, वे ही आदिदेव, जगन्नाथ, लोककर्ता और स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वे सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण तथा स्वयं आदि-अन्तसे रहित हैं। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेके कारण वे अच्युत कहलाते हैं। व्याकुर्वते यस्य तत्त्वं श्रुतयो मुनयश्च ह । अतोऽजय्यः सर्वभूतैर्मनसापि जगत्पतिः ।।) श्रुतियाँ और महर्षिगण उन्हींके तत्त्वका विवेचन करते हैं। अतः उन जगदीश्वरको समस्त प्राणी मनसे भी जीतनेमें असमर्थ हैं। अजायत च कार्यार्थं पुत्रो धर्मस्य विश्वकृत् ।। ५७ ।। वे विश्वविधाता भगवान् एक समय किसी विशेष कार्यके लिये धर्मके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए थे ।। ५७ ।। स तपस्तीव्रमातस्थे शिशिरं गिरिमास्थितः । ऊर्ध्वबाहुर्महातेजा ज्वलनादित्यसंनिभः ।। ५८ ।। अग्नि और सूर्यके समान महातेजस्वी उन भगवान् नारायणने हिमालय पर्वतपर रहकर अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हुए बड़ी कठोर तपस्या की थी ।। ५८ ।। षष्टिं वर्षसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च ।