महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1576, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे ही भव, वे ही मेघ और वे ही सनातन महादेव हैं। चन्द्रमा, ईशान, सूर्य और वरुण भी वे ही हैं ॥ १०३ ॥
स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि तु ।
मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः ॥ १०४ ॥
वे ही काल, अन्तक, मृत्यु, यम, रात्रि, दिन, मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर हैं ॥ १०४ ॥
धाता च स विधाता च विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ।
सर्वासां देवतानां च धारयत्यवपुर्वपुः ॥ १०५ ॥
वे ही धाता, विधाता, विश्वात्मा और विश्वरूपी कार्यके कर्ता हैं। वे शरीररहित होकर भी सम्पूर्ण देवताओंके शरीर धारण करते हैं ॥ १०५ ॥
सर्वदेवैः स्तुतो देवः सैकधा बहुधा च सः ।
शतधा सहस्रधा चैव भूयः शतसहस्रधा ॥ १०६ ॥
सम्पूर्ण देवता सदा उनकी स्तुति करते हैं। वे महादेवजी एक होकर भी अनेक हैं। सौ, हजार और लाखों रूपोंमें वे ही विराज रहे हैं ॥ १०६ ॥
द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरा चान्या शिवा चान्या ते तनू बहुधा पुनः ॥ १०७ ॥
वेदज्ञ ब्राह्मण उनके दो शरीर मानते हैं, एक घोर और दूसरा शिव। ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं और उन्हींसे पुनः बहुसंख्यक शरीर प्रकट हो जाते हैं ॥ १०७ ॥
घोरा तु या तनुस्तस्य सोऽग्निर्विष्णुः स भास्करः ।
सौम्या तु पुनरेवास्य आपो ज्योतींषि चन्द्रमाः ॥ १०८ ॥
उनका जो घोर शरीर है, वही अग्नि, विष्णु और सूर्य है और उनका सौम्य (शिव) शरीर ही जल, ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा है ॥ १०८ ॥
वेदाः साङ्गोपनिषदः पुराणाध्यात्मनिश्चयाः ।
यदत्र परमं गुह्यं स वै देवो महेश्वरः ॥ १०९ ॥
वेद, वेदांग, उपनिषद्, पुराण और अध्यात्मशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं तथा उनमें भी जो परम रहस्य है, वह भगवान् महेश्वर ही हैं ॥ १०९ ॥
ईदृशश्च महादेबो भूयांश्र्च भगवानजः ।
न हि सर्वे मया शक्या वक्तुं भगवतो गुणाः ॥ ११० ॥
अपि वर्षसहस्रेण सततं पाण्डुनन्दन ।
अर्जुन! यह है अजन्मा भगवान् महादेवका महामहिमस्वरूप। मैं सहस्रों वर्षोंतक लगातार वर्णन करता रहूँ तो भी भगवान्के समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ॥ ११० १/२ ॥
सर्वैर्ग्रहैर्गृहीतान् वै सर्वपापसमन्वितान् ॥ १११ ॥