भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1577

स मोचयति सुप्रीतः शरण्यः शरणागतान् ।
जो सब प्रकारकी ग्रहबाधाओंसे पीड़ित हैं और सम्पूर्ण पापोंमें डूबे हुए हैं, वे भी यदि शरणमें आ जायँ तो शरणागतवत्सल भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें पाप-तापसे मुक्त कर देते हैं ।। १११ १/२ ।।
आयुरायोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ।। ११२ ।।
स ददाति मनुष्येभ्यः स चैवाक्षिपते पुनः ।
वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और प्रचुरमात्रामें मनोवांछित पदार्थ देते हैं तथा वे ही कुपित होनेपर फिर उन सबका संहार कर डालते हैं ।। ११२ १/२ ।।
सेन्द्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते ।। ११३ ।।
स चैव व्यापृतो लोके मनुष्याणां शुभाशुभे ।
ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरश्च स उच्यते ।। ११४ ।।
इन्द्र आदि देवताओंमें उन्हींका ऐश्वर्य बताया जाता है, वे ही ईश्वर होनेके कारण लोकमें मनुष्योंके शुभाशुभ कर्मोंके फल देनेमें संलग्न रहते हैं। सम्पूर्ण कामनाओंके ईश्वर भी वे ही बताये जाते हैं ।। ११३-११४ ।।
महेश्वरश्च महतां भूतानामीश्वरश्च सः ।
बहुभिर्बहुधा रूपैर्विश्वं व्याप्नोति वै जगत् ।। ११५ ।।
महाभूतोंके ईश्वर होनेसे वे ही महेश्वर कहलाते हैं। वे नाना प्रकारके बहुसंख्यक रूपोंद्वारा सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं ।। ११५ ।।
तस्य देवस्य यद् वक्त्रं समुद्रे तदधिष्ठितम् ।
वडवामुखेति विख्यातं पिबत् तोयमयं हविः ।। ११६ ।।
उन महादेवजीका जो मुख है, वह समुद्रमें स्थित है। वह 'वडवामुख' नामसे विख्यात होकर जलमय हविष्यका पान करता है ।। ११६ ।।
एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः ।
यजन्त्येनं जनास्तत्र वीरस्थान इतीश्वरम् ।। ११७ ।।
ये ही महादेवजी श्मशानभूमि (काशीपुरी)-में नित्य निवास करते हैं। वहाँ मनुष्य 'वीरस्थानेश्वर' के नामसे इनकी आराधना करते हैं ।। ११७ ।।
अस्य दीप्तानि रूपाणि घोराणि च बहूनि च ।
लोके यान्यस्य पूज्यन्ते मनुष्याः प्रवदन्ति च ।। ११८ ।।
इनके बहुत-से तेजस्वी घोर रूप हैं, जो लोकमें पूजित होते हैं और मनुष्य उनका कीर्तन करते रहते हैं ।। ११८ ।।
नामधेयानि लोकेषु बहून्यस्य यथार्थवत् ।
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मणस्तथा ।। ११९ ।।