महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1578, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनकी महत्ता, सर्वव्यापकता तथा कर्मके अनुसार लोकमें इनके बहुत-से यथार्थ नाम बताये जाते हैं ।। ११९ ।।
वेदे चास्य समाम्नातं शतरुद्रियमुत्तमम् ।
नाम्ना चानन्तरुद्रेति ह्युपस्थानं महात्मनः ।। १२० ।।
यजुर्वेदमें भी परमात्मा शिवकी 'शतरुद्रिय' नामक उत्तम स्तुति बतायी गयी है। अनन्तरुद्रनामसे इनका उपस्थान बताया गया है ।। १२० ।।
स कामानां प्रभुर्देवो ये दिव्या ये च मानुषाः ।
स विभुः स प्रभुर्देवो विश्वं व्याप्नोति वै महत् ।। १२१ ।।
जो दिव्य तथा मानव भोग हैं, उन सबके स्वामी ये महादेवजी ही हैं। ये देव इस विशाल विश्वमें व्याप्त हैं; इसलिये विभु और प्रभु कहलाते हैं ।। १२१ ।।
ज्येष्ठं भूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा मुनयस्तथा ।
प्रथमो ह्येष देवानां मुखादस्यानलोऽभवत् ।। १२२ ।।
ब्राह्मण और मुनिजन इन्हें सबसे ज्येष्ठ बताते हैं, ये देवताओंमें सबसे प्रथम हैं; इन्हींके मुखसे अग्निदेवका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १२२ ।।
सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते पुनः ।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ।। १२३ ।।
ये सर्वथा पशुओं (प्राणियों)-का पालन करते और उन्हींके साथ खेला करते हैं तथा उन पशुओंके अधिपति हैं; इसलिये 'पशुपति' कहे गये हैं ।। १२३ ।।
दिव्यं च ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यथा स्थितम् ।
महयत्येष लोकांश्च महेश्वर इति स्मृतः ।। १२४ ।।
इनका दिव्य लिंग ब्रह्मचर्यसे स्थित है। ये सम्पूर्ण लोकोंको महिमान्वित करते हैं; इसलिये महेश्वर कहे गये हैं ।। १२४ ।।
ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
लिङ्गमस्यार्चयन्ति स्म तच्चाप्यूर्ध्वं समास्थितम् ।। १२५ ।।
ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ इनके ऊर्ध्वलोकस्थित लिंगविग्रह (प्रतीक)-की पूजा करती हैं ।। १२५ ।।
पूज्यमाने ततस्तस्मिन् मोदते स महेश्वरः ।
सुखी प्रीतश्च भवति प्रहृष्टश्चैव शङ्करः ।। १२६ ।।
उस लिंग अर्थात् प्रतीककी पूजा होनेपर कल्याणकारी भगवान् महेश्वर आनन्दित होते हैं। सुखी, प्रसन्न तथा हर्षोल्लाससे परिपूर्ण होते हैं ।। १२६ ।।
यदस्य बहुधा रूपं भूतभव्यभवस्थितम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ।। १२७ ।।