भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1579

भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें इनके स्थावर-जंगम बहुत-से रूप स्थित होते हैं; इसलिये इन्हें 'बहुरूप' नाम दिया गया है ।। १२७ ।।
एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
क्रोधाद् यश्चाविशल्लोकांस्तस्मात् सर्व इति स्मृतः ।। १२८ ।।
यद्यपि उनके सब ओर नेत्र हैं, तथापि उनका एक विलक्षण अग्निमय नेत्र अलग भी है, जो सदा क्रोधसे प्रज्वलित रहता है; वे सब लोकोंमें समाविष्ट होनेके कारण 'सर्व' कहे गये हैं ।। १२८ ।।
धूम्ररूपं च यत् तस्य धूर्जटिस्तेन चोच्यते ।
विश्वेदेवाश्च यत् तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ।। १२९ ।।
उनका रूप धूम्रवर्णका है; इसलिये वे 'धूर्जटि' कहलाते हैं। विश्वेदेव उन्हींमें प्रतिष्ठित हैं, इसलिये उनका एक नाम 'विश्वरूप' है ।। १२९ ।।
तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वरः ।
द्यामपः पृथिवीं चैव त्र्यम्बकश्च ततः स्मृतः ।। १३० ।।
वे भगवान् भुवनेश्वर आकाश, जल और पृथ्वी इन अम्बास्वरूपा तीन देवियोंको अपनाते, उनकी रक्षा करते हैं, इसलिये त्र्यम्बक कहे गये हैं ।। १३० ।।
समेधयति यन्नित्यं सर्वार्थान् सर्वकर्मसु ।
शिवमिच्छन् मनुष्याणां तस्मादेष शिवः स्मृतः ।। १३१ ।।
ये मनुष्योंका कल्याण चाहते हुए उनके समस्त कर्मोंमें सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंकी समृद्धि (सिद्धि) करते हैं, इसलिये 'शिव' कहे गये हैं ।। १३१ ।।
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ।। १३२ ।।
उनके सहस्र अथवा दस हजार नेत्र हैं अथवा वे सब ओरसे नेत्रमय ही हैं। भगवान् शिव महान् विश्वका पालन करते हैं; इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं ।। १३२ ।।
महत् पूर्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत् ।
स्थितलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः ।। १३३ ।।
वे पूर्वकालसे ही महान् रूपमें स्थित हैं, प्राणोंकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा उनका लिंगमय शरीर सदा स्थिर रहता है; इसलिये उन्हें 'स्थाणु' कहते हैं ।। १३३ ।।
सूर्याचन्द्रमसोर्लोके प्रकाशन्ते रुचश्च याः ।
ताः केशसंज्ञितास्त्र्यक्षे व्योमकेशस्ततः स्मृतः ।। १३४ ।।
लोकमें जो सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें प्रकाशित होती हैं, वे भगवान् त्रिलोचनके केश कही गयी हैं। वे व्योम (आकाश)-में प्रकाशित होती हैं; इसलिये उनका नाम 'व्योमकेश' है ।। १३४ ।।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं जगदशेषतः ।