महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1580, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभव एव ततो यस्माद् भूतभव्यभवोद्भवः ॥ १३५ ॥ भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण जगत् भगवान् शंकरसे ही विस्तारको प्राप्त हुआ है; इसलिये वे ‘भूतभव्यभवोद्भव’ कहे गये हैं ॥ १३५ ॥
कपिः श्रेष्ठ इति प्रोक्तो धर्मश्च वृष उच्यते । स देवदेवो भगवान् कीर्त्यतेऽतो वृषाकपिः ॥ १३६ ॥ कपि कहते हैं श्रेष्ठको और वृष नाम है धर्मका। वृष और कपि दोनों होनेके कारण देवाधिदेव भगवान् शंकर ‘वृषाकपि’ कहलाते हैं ॥ १३६ ॥
ब्रह्माणमिन्द्रं वरुणं यमं धनदमेव च । निगृह्य हरते यस्मात् तस्माद्धर इति स्मृतः ॥ १३७ ॥ वे ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, यम तथा कुबेरको भी काबूमें करके उनसे उनका ऐश्वर्य हर लेते हैं; इसलिये ‘हर’ कहे गये हैं ॥ १३७ ॥
निमीलिताभ्यां नेत्राभ्यां बलाद् देवो महेश्वरः । ललाटे नेत्रमसृजत् तेन त्र्यक्षः स उच्यते ॥ १३८ ॥ उन भगवान् महेश्वरने दोनों नेत्रोंको बंद करके अपने ललाटमें बलपूर्वक तीसरे नेत्रकी सृष्टि की, इसलिये उन्हें त्रिनेत्र कहते हैं ॥ १३८ ॥
विषमस्थः शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह । स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोऽपानः शरीरिषु ॥ १३९ ॥ वे प्राणियोंके शरीरोंमें विषम संख्यावाले पाँच प्राणोंके साथ निवास करते हुए सदा समभावसे स्थित रहते हैं। विषम परिस्थितियोंमें पड़े हुए समस्त देहधारियोंके भीतर वे ही प्राणवायु और अपानवायुके रूपमें विराजमान हैं ॥ १३९ ॥
पूजयेद् विग्रहं यस्तु लिङ्गं चापि महात्मनः । लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १४० ॥ जो कोई भी मनुष्य हो, उसे महात्मा शिवके अर्चाविग्रह अथवा लिंग (प्रतीक)-की पूजा करनी चाहिये। लिंग अथवा प्रतिमाकी पूजा करनेवाला पुरुष बड़ी भारी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १४० ॥
ऊरुभ्यामर्धमाग्नेयं सोमर्धं च शिवा तनुः । आत्मनोऽर्धं तथा चाग्निः सोमोऽर्धं पुनरुच्यते ॥ १४१ ॥ दोनों जाँघोंसे नीचे भगवान् शिवका आधा शरीर आग्नेय अथवा घोर है तथा उससे ऊपरका आधा शरीर सोम एवं शिव है। किसी-किसीके मतमें उनके सम्पूर्ण शरीरका आधा भाग ‘अग्नि’ और आधा भाग ‘सोम’ कहलाता है ॥ १४१ ॥
तैजसी महती दीप्ता देवेभ्योऽस्य शिवा तनुः । भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराग्निरुच्यते ॥ १४२ ॥