महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1582, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ।। १४९ ।। चतुर्विधमिदं स्तोत्रं यः शृणोति नरः सदा । विजित्य शत्रून् सर्वान् स रुद्रलोके महीयते ।। १५० ।। जो मनुष्य भगवान् शंकरके ब्रह्मा, विष्णु महेश और निर्गुण निराकार—इन चतुर्विध स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाले इस स्तोत्रको सदा सुनता है, वह सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। १५० ।। चरितं महात्मनो नित्यं सांग्रामिकमिदं स्मृतम् । पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः ।। १५१ ।। भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा । वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः ।। १५२ ।। परमात्मा शिवका यह चरित सदा संग्राममें विजय दिलानेवाला है, जो सदा उद्यत रहकर शतरुद्रियको पढ़ता और सुनता है तथा मनुष्योंमें जो कोई भी निरन्तर भगवान् विश्वेश्वरका भक्तिभावसे भजन करता है, वह उन त्रिलोचनके प्रसन्न होनेपर समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। १५१-१५२ ।। गच्छ युद्ध्यस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजयः । यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दनः ।। १५३ ।। कुन्तीनन्दन! जाओ, युद्ध करो। तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि तुम्हारे मन्त्री, रक्षक और पार्श्ववर्ती साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हैं ।। १५३ ।।