महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1584, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंय इदं पठते पर्व शृणुयाद् वापि नित्यशः । स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः ॥ १५७ ॥ जो प्रतिदिन इस पर्वको पढ़ता अथवा सुनता है, वह पहलेके किये हुए बड़े-बड़े पापों तथा घोर कर्मोंसे मुक्त हो जाता है ।। १५७ ।।
यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च । शेषौ वर्णौ काममिष्टं लभेते पुत्रान् पौत्रान् नित्यमिष्टांस्तथैव ॥ १५८ ॥ इसको प्रतिदिन पढ़ने और सुननेसे ब्राह्मणको यज्ञका फल प्राप्त होता है, क्षत्रियोंको घोर युद्धमें सुयशकी प्राप्ति होती है, शेष दो वर्णके लोगोंको भी पुत्र, पौत्र आदि अभीष्ट एवं प्रिय वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं ।। १५८ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २०२ ।।
[द्रोणपर्व सम्पूर्णम्]
| अनुष्टुप् छन्द | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुलयोग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ९३७९॥ | (२९१॥) | ४००॥।- | ९७८०।- |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | १३० | (५) | ६॥।= | १३६॥।= |
| द्रोणपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक-संख्या | ९९१७≡ |
श्रवण-महिमा
स्वधीते यत् फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि ।