महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1588, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवन्दीजनोंद्वारा विजय-सूचक आशीर्वादोंसे अभिवन्दित हो युद्धके लिये निकले ॥ १०—१२ ॥
तथैव पाण्डवा राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ।
शिबिरान्निर्ययुस्तूर्णं युद्धाय कृतनिश्चयाः ॥ १३ ॥
राजन्! इसी प्रकार पाण्डव भी पूर्वाह्नमें किये जानेवाले नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करके तुरंत ही शिविरसे बाहर निकले। उन्होंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १३ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च परस्परजयैषिणाम् ॥ १४ ॥
तदनन्तर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले कौरवों और पाण्डवोंमें भयंकर रोमांचकारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥
तयोर्द्वौ दिवसौ युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ।
कर्णे सेनापतौ राजन् बभूवाद्भुतदर्शनम् ॥ १५ ॥
राजन्! कर्णके सेनापति हो जानेपर उन कौरव-पाण्डव-सेनाओंमें दो दिनोंतक अद्भुत युद्ध हुआ ॥ १५ ॥
ततः शत्रुक्षयं कृत्वा सुमहान्तं रणे वृषः ।
पश्यतां धार्तराष्ट्राणां फाल्गुनेन निपातितः ॥ १६ ॥
उस युद्धमें शत्रुओंका महान् संहार करके कर्ण धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥
ततस्तु संजयः सर्वं गत्वा नागपुरं द्रुतम् ।
आचष्ट धृतराष्ट्राय यद् वृत्तं कुरुजाङ्गले ॥ १७ ॥
तदनन्तर संजयने तुरंत हस्तिनापुरमें जाकर कुरुक्षेत्रमें जो घटना घटित हुई थी, वह सब धृतराष्ट्रसे कह सुनायी ॥ १७ ॥
जनमेजय उवाच
आपगेयं हतं श्रुत्वा द्रोणं चापि महारथम् ।
आजगाम परामार्तिं वृद्धो राजाम्बिकासुतः ॥ १८ ॥
**जनमेजय बोले—**ब्रह्मन्! गंगानन्दन भीष्म तथा महारथी द्रोणको मारा गया सुनकर ही बूढ़े राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रको बड़ी भारी वेदना हुई थी ॥ १८ ॥
स श्रुत्वा निहतं कर्णं दुर्योधनहितैषिणम् ।
कथं द्विजवर प्राणानधारयत दुःखितः ॥ १९ ॥
द्विजश्रेष्ठ! फिर दुर्योधनके हितैषी कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखी हो उन्होंने अपने प्राण कैसे धारण किये? ॥ १९ ॥
यस्मिञ्जयाशां पुत्राणां सममन्यत पार्थिवः ।