महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1589, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मिन् हते स कौरव्यः कथं प्राणानधारयत् ॥ २० ॥ कुरुवंशी राजाने जिसके ऊपर अपने पुत्रोंकी विजयकी आशा बाँध रखी थी, उसके मारे जानेपर उन्होंने कैसे प्राण धारण किये? ॥ २० ॥ दुर्मरं तदहं मन्ये नृणां कृच्छ्रेऽपि वर्तताम् । यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा नात्यजज्जीवितं नृपः ॥ २१ ॥ मैं समझता हूँ कि बड़े भारी संकटमें पड़ जानेपर भी मनुष्योंके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करना अत्यन्त कठिन है, तभी तो कर्णवधका वृत्तान्त सुनकर भी राजा धृतराष्ट्रने इस जीवनका त्याग नहीं किया ॥ २१ ॥ तथा शान्तनवं वृद्धं ब्रह्मन् बाह्लीकमेव च । द्रोणं च सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ॥ २२ ॥ तथैव चान्यान् सुहृदः पुत्रान् पौत्रांश्च पातितान् । श्रुत्वा यन्नाजहात् प्राणांस्तन्मन्ये दुष्करं द्विज ॥ २३ ॥ ब्रह्मन्! उन्होंने वृद्ध शान्तनुनन्दन भीष्म, बाह्लीक, द्रोण, सोमदत्त तथा भूरिश्रवाको और अन्यान्य सुहृदों, पुत्रों एवं पौत्रोंको भी शत्रुओंद्वारा मारा गया सुनकर भी जो अपने प्राण नहीं छोड़े, उससे मुझे यही मालूम होता है कि मनुष्यके लिये स्वेच्छापूर्वक मरना बहुत कठिन है ॥ २२-२३ ॥ एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने । न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ २४ ॥ महामुने! यह सारा वृत्तान्त आप मुझसे विस्तारपूर्वक कहें। मैं अपने पूर्वजोंका महान् चरित्र सुनकर तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि जनमेजयवाक्यं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें जनमेजयवाक्य नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥