महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1629, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिसी कार्यको अन्य प्रकारसे सोचा जाता है, किंतु वह दैववश और ही प्रकारका हो जाता है। अहो! निश्चय ही दैव प्रबल और काल दुर्लङ्घ्य है ॥ २०१/२ ॥ पलायमानः कृपणो दीनात्मा दीनपौरुषः ॥ २१ ॥ कच्चिद् विनिहतः सूत पुत्रो दुःशासनो मम । कच्चिन्न दीनाचरितं कृतवांस्तात संयुगे ॥ २२ ॥ कच्चिन्न निहतः शूरो यथान्ये क्षत्रियर्षभाः । सूत! क्या मेरा पुत्र दुःशासन दीनचित्त और पुरुषार्थशून्य होकर कायरके समान भागता हुआ मारा गया। तात! उसने युद्धस्थलमें कोई दीनतापूर्ण बर्ताव तो नहीं किया था। जैसे अन्य क्षत्रियशिरोमणि मारे गये हैं, क्या उसी प्रकार शूरवीर दुःशासन नहीं मारा गया? ॥ २१-२२१/२ ॥ युधिष्ठिरस्य वचनं मा युध्यस्वेति सर्वदा ॥ २३ ॥ दुर्योधनो नाभ्यगृह्णान्मूढः पथ्यमौषधम् । युधिष्ठिर सदा यही कहते रहे कि ‘युद्ध न करो।’ परंतु मूर्ख दुर्योधनने हितकारक औषधके समान उनके उस वचनको ग्रहण नहीं किया ॥ २३१/२ ॥ शरतल्पे शयानेन भीष्मेण सुमहात्मना ॥ २४ ॥ पानीयं याचितः पार्थः सोऽविध्यन्मेदिनीतलम् । जलस्य धारां जनितां दृष्ट्वा पाण्डुसुतेन च ॥ २५ ॥ अब्रवीत् स महाबाहुस्तात संशाम्य पाण्डवैः । प्रशमाद्धि भवेच्छान्तिर्मदन्तं युद्धमस्तु वः ॥ २६ ॥ भ्रातृभावेन पृथिवीं भुङ्क्ष्व पाण्डुसुतैः सह । बाण-शय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मने अर्जुनसे पानी माँगा और उन्होंने इसके लिये पृथ्वीको छेद दिया। इस प्रकार पाण्डुपुत्र अर्जुनके द्वारा प्रकट की हुई उस जलधाराको देखकर महाबाहु भीष्मने दुर्योधनसे कहा—‘तात! पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। संधिसे वैरकी शान्ति हो जायगी, तुमलोगोंका यह युद्ध मेरे जीवनके साथ ही समाप्त हो जाय। तुम पाण्डवोंके साथ भ्रातृभाव बनाये रखकर पृथ्वीका उपभोग करो’ ॥ २४—२६१/२ ॥ अकुर्वन् वचनं तस्य नूनं शोचति पुत्रकः ॥ २७ ॥ तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दीर्घदर्शिनः । उनकी इस बातको न माननेके कारण अवश्य ही मेरा पुत्र शोक कर रहा है। दूरदर्शी भीष्मजीकी वह बात आज सफल होकर सामने आयी है ॥ २७१/२ ॥ अहं तु निहतामात्यो हतपुत्रश्च संजय ॥ २८ ॥ द्यूततः कृच्छ्रमापन्नो लूनपक्ष इव द्विजः ।