महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंजय! मेरे मन्त्री और पुत्र मारे गये। मैं तो पंख कटे हुए पक्षीके समान जूएके कारण भारी संकटमें पड़ गया हूँ॥ २८ ½ ॥
यथा हि शकुनिं गृह्य छित्त्वा पक्षौ च संजय ॥ २९ ॥
विसर्जयन्ति संहृष्टाः क्रीडमानाः कुमारकाः ।
लूनपक्षतया तस्य गमनं नोपपद्यते ॥ ३० ॥
तथाहमपि सम्प्राप्तो लूनपक्ष इव द्विजः ।
सूत! जैसे खेलते हुए बालक किसी पक्षीको पकड़कर उसकी दोनों पाँखें काट लेते और प्रसन्नतापूर्वक उसे छोड़ देते हैं। फिर पंख कट जानेके कारण उसका उड़कर कहीं जाना सम्भव नहीं हो पाता। उसी कटे हुए पंखवाले पक्षीके समान मैं भी भारी दुर्दशामें पड़ गया हूँ॥ २९-३० ½ ॥
क्षीणः सर्वार्थहीनश्च निर्ज्ञातिर्बन्धुवर्जितः ।
कां दिशं प्रतिपत्स्यामि दीनः शत्रुवशं गतः ॥ ३१ ॥
मैं शरीरसे दुर्बल, सारी धन-सम्पत्तिसे वंचित तथा कुटुम्बीजनों और बन्धु-बान्धवोंसे रहित हो शत्रुके वशमें पड़कर दीनभावसे किस दिशाको जाऊँगा? ॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवं धृतराष्ट्रोऽथ विलप्य बहु दुःखितः ।
प्रोवाच संजयं भूयः शोकव्याकुलमानसः ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—इस प्रकार विलाप करके अत्यन्त दुःखी और शोकसे व्याकुलचित्त हो धृतराष्ट्रने पुनः संजयसे इस प्रकार कहा॥ ३२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
योऽजयत् सर्वकाम्बोजानम्बष्ठान् केकयैः सह ।
गान्धारांश्च विदेहांश्च जित्वा कार्यार्थमाहवे ॥ ३३ ॥
दुर्योधनस्य वृद्ध्यर्थं योऽजयत् पृथिवीं प्रभुः ।
स जितः पाण्डवैः शूरैः समरे बाहुशालिभिः ॥ ३४ ॥
धृतराष्ट्र बोले—संजय! जिसने हमारे कार्यके लिये युद्धस्थलमें सम्पूर्ण काम्बोज-निवासियों, अम्बष्ठों, केकयों, गान्धारों और विदेहोंपर विजय पायी। इन सबको जीतकर जिसने दुर्योधनकी वृद्धिके लिये समस्त भूमण्डलको जीत लिया था। वही सामर्थ्यशाली कर्ण अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर पाण्डवोंद्वारा समरांगणमें परास्त हो गया॥ ३३-३४ ॥
तस्मिन् हते महेष्वासे कर्णे युधि किरीटिना ।
के वीराः पर्यतिष्ठन्त तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ३५ ॥