महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1642, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रुत्वा यथेष्टं च कुरु वीर यत् तव रोचते । भवान् प्राज्ञतमो नित्यं मम चैव परा गतिः ॥ २३ ॥ ‘वीर! मेरी यह बात सुनकर तुम अपनी इच्छाके अनुसार जो तुम्हें अच्छा लगे, वह करो। तुम बहुत बड़े बुद्धिमान् तो हो ही, सदाके लिये मेरे सबसे बड़े सहारे भी हो ॥ २३ ॥
भीष्मद्रोणावतिरथौ हतौ सेनापती मम । सेनापतिर्भवानस्तु ताभ्यां द्रविणवत्तरः ॥ २४ ॥ ‘मेरे दो सेनापति पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण, जो अतिरथी वीर थे, युद्धमें मारे गये। अब तुम मेरे सेनानायक बनो; क्योंकि तुम उन दोनोंसे भी अधिक शक्तिशाली हो ॥ २४ ॥
वृद्धौ च तौ महेष्वासौ सापेक्षौ च धनंजये । मानितौ च मया वीरौ राधेय वचनात् तव ॥ २५ ॥ ‘वे दोनों महाधनुर्धर होते हुए भी बूढ़े थे और अर्जुनके प्रति उनके मनमें पक्षपात था। राधानन्दन! मैंने तुम्हारे कहनेसे ही उन दोनों वीरोंको सेनापति बनाकर सम्मानित किया था ॥ २५ ॥
पितामहत्वं सम्प्रेक्ष्य पाण्डुपुत्रा महारणे । रक्षितास्तात भीष्मेण दिवसानि दशैव तु ॥ २६ ॥ ‘तात! भीष्मने पितामहके नातेकी ओर दृष्टिपात करके उस महासमरमें दस दिनोंतक पाण्डवोंकी रक्षा की है ॥ २६ ॥
न्यस्तशस्त्रे च भवति हतो भीष्मः पितामहः । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य फाल्गुनेन महाहवे ॥ २७ ॥ ‘उन दिनों तुमने हथियार रख दिया था; इसलिये महासमरमें अर्जुनने शिखण्डीको आगे करके पितामह भीष्मको मार डाला था ॥ २७ ॥
हते तस्मिन् महेष्वासे शरतल्पगते तथा । त्वयोक्ते पुरुषव्याघ्र द्रोणो ह्वासीत् पुरःसरः ॥ २८ ॥ ‘पुरुषसिंह! उन महाधनुर्धर भीष्मके घायल होकर बाण-शय्यापर सो जानेके बाद तुम्हारे कहनेसे ही द्रोणाचार्य हमारी सेनाके अगुआ बनाये गये थे ॥ २८ ॥
तेनापि रक्षिताः पार्थाः शिष्यत्वादिति मे मतिः । स चापि निहतो वृद्धो धृष्टद्युम्नेन सत्वरम् ॥ २९ ॥ ‘मेरा विश्वास है कि उन्होंने भी अपना शिष्य समझकर कुन्तीके पुत्रोंकी रक्षा की है। वे बूढ़े आचार्य भी शीघ्र ही धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ॥ २९ ॥
निहताभ्यां प्रधानाभ्यां ताभ्याममितविक्रम । त्वत्समं समरे योधं नान्यं पश्यामि चिन्तयन् ॥ ३० ॥