भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1643

‘अमितपराक्रमी वीर! उन प्रधान सेनापतियोंके मारे जानेके पश्चात् मैं बहुत सोचनेपर भी समरांगणमें तुम्हारे समान दूसरे किसी योद्धाको नहीं देखता ।। ३० ।।

भवानेव तु नः शक्तो विजयाय न संशयः ।
पूर्वं मध्ये च पश्चाच्च तथैव विहितं हितम् ।। ३१ ।।
‘हमलोगोंमेंसे तुम्हीं शत्रुओंपर विजय पानेमें समर्थ हो, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तुमने पहले, बीचमें और पीछे भी हमारा हित ही किया है ।। ३१ ।।

स भवान् धुर्यवत् संख्ये धुरमुद्वोढुमर्हति ।
अभिषेचय सैनान्ये स्वयमात्मानमात्मना ।। ३२ ।।
‘तुम धुरन्धर पुरुषकी भाँति युद्धस्थलमें सेना-संचालनका भार वहन करनेके योग्य हो; इसलिये स्वयं ही अपने-आपको सेनापतिके पदपर अभिषिक्त कराओ ।। ३२ ।।

देवतानां यथा स्कन्दः सेनानीः प्रभुरव्ययः ।
तथा भवानिमां सेनां धार्तराष्ट्रीं बिभर्तु वै ।। ३३ ।।
‘जैसे अविनाशी भगवान् स्कन्द देवताओंकी सेनाका संचालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाको अपनी अध्यक्षतामें ले लो ।। ३३ ।।

जहि शत्रुगणान् सर्वान् महेन्द्रो दानवानिव ।
अवस्थितं रणे दृष्ट्वा पाण्डवास्त्वां महारथाः ।। ३४ ।।
द्रविष्यन्ति च पाञ्चाला विष्णुं दृष्ट्वेव दानवाः ।
तस्मात् त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकर्षैतां महाचमूम् ।। ३५ ।।
‘जैसे देवराज इन्द्रने दानवोंका संहार किया था, उसी प्रकार तुम भी समस्त शत्रुओंका वध करो। जैसे दानव भगवान् विष्णुको देखते ही भाग जाते हैं, उसी प्रकार पाण्डव तथा पांचाल महारथी तुम्हें रणभूमिमें सेनापतिके रूपमें उपस्थित देखकर भाग खड़े होंगे; अतः पुरुषसिंह! तुम इस विशाल सेनाका संचालन करो ।। ३४-३५ ।।

भवत्यवस्थिते यत्ते पाण्डवा मन्दचेतसः ।
द्रविष्यन्ति सहामात्याः पाञ्चालाः सृंजयाश्च ह ।। ३६ ।।
‘तुम्हारे सावधानीके साथ खड़े होते ही मूर्ख पाण्डव, पांचाल और सृंजय अपने मन्त्रियोंसहित भाग जायँगे ।। ३६ ।।

यथा ह्यभ्युदितः सूर्यः प्रतपन् स्वेन तेजसा ।
व्यपोहति तमस्तीव्रं तथा शत्रून् प्रतापय ।। ३७ ।।
‘जैसे उदित हुआ सूर्य अपने तेजसे तपकर घोर अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंको संतप्त एवं नष्ट करो’ ।। ३७ ।।

संजय उवाच

आशा बलवती राजन् पुत्रस्य तव याभवत् ।