महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1644, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहते भीष्मे च द्रोणे च कर्णो जेष्यति पाण्डवान् ।। ३८ ।। तामाशां हृदये कृत्वा कर्णमेवं तदाब्रवीत् । सूतपुत्र न ते पार्थः स्थित्वाग्रे संयुयुत्सति ।। ३९ ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! आपके पुत्रके मनमें जो यह प्रबल आशा हो गयी थी कि भीष्म और द्रोणके मारे जानेपर कर्ण पाण्डवोंको जीत लेगा, वही आशा मनमें लेकर उस समय उसने कर्णसे इस प्रकार कहा—‘सूतपुत्र! अर्जुन तुम्हारे सामने खड़े होकर कभी युद्ध करना नहीं चाहते हैं’ ।। ३८-३९ ।।
कर्ण उवाच
उक्तमेतन्मया पूर्वं गान्धारे तव संनिधौ । जेष्यामि पाण्डवान् सर्वान् सपुत्रान् सजनार्दनान् ।। ४० ।। **कर्णने कहा—**गान्धारीनन्दन! मैंने तुम्हारे समीप पहले ही यह बात कह दी है कि मैं पाण्डवोंको, उनके पुत्रों और श्रीकृष्णके साथ ही परास्त कर दूँगा ।। ४० ।। सेनापतिर्भविष्यामि तवाहं नात्र संशयः । स्थिरो भव महाराज जितान् विद्धि च पाण्डवान् ।। ४१ ।। महाराज! तुम धैर्य धारण करो। मैं तुम्हारा सेनापति बनूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। अब पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझो ।। ४१ ।।
संजय उवाच
एवमुक्तो महाराज ततो दुर्योधनो नृपः । उत्तस्थौ राजभिः सार्धं देवैरिव शतक्रतुः ।। ४२ ।। **संजय कहते हैं—**महाराज! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन अन्य सामन्त नरेशोंके साथ उसी प्रकार उठकर खड़ा हो गया, जैसे देवताओंके साथ इन्द्र खड़े होते हैं ।। ४२ ।। सैनापत्येन सत्कर्तुं कर्णं स्कन्दमिवामराः । ततोऽभिषिषिचुः कर्णं विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ४३ ।। दुर्योधनमुखा राजन् राजानो विजयैषिणः । जैसे देवताओंने स्कन्दको सेनापति बनाकर उनका सत्कार किया था, उसी प्रकार समस्त कौरव कर्णको सेनापति बनाकर उसका सत्कार करनेके लिये उद्यत हुए। राजन्! विजयाभिलाषी दुर्योधन आदि राजाओंने शास्त्रोक्त विधिके द्वारा कर्णका अभिषेक किया ।। ४३ १/२ ।।