भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1645

शातकुम्भमयैः कुम्भैर्माद्तिकैश्चाभिमन्त्रितैः ॥ ४४ ॥
तोयपूर्णविषाणैश्च द्विपखड्गमहर्षभैः ।
मणिमुक्तायुतैश्चान्यैः पुण्यगन्धैस्तथौषधैः ॥ ४५ ॥
औदुम्बरे सुखासीनमासने क्षौमसंवृते ।
शास्त्रदृष्टेन विधिना सम्भारैश्च सुसम्भृतैः ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च सम्मताः ।
तुष्टुवुस्तं महात्मानमभिषिक्तं वरासने ॥ ४७ ॥

अभिषेकके लिये सोने तथा मिट्टीके घड़ोंमें अभिमन्त्रित जल रखे गये थे। हाथीके दाँत तथा गैंडे और बैलके सींगोंके बने हुए पात्रोंमें भी पृथक्-पृथक् जल रखा गया था। उन पात्रोंमें मणि और मोती भी थे। अन्यान्य पवित्र गन्धशाली पदार्थ और औषध भी डाले गये थे। कर्ण गूलरकाठकी बनी हुई चौकीपर, जिसके ऊपर रेशमी कपड़ा बिछा हुआ था, सुखपूर्वक बैठा था। उस अवस्थामें शास्त्रीय विधिके अनुसार पूर्वोक्त सुसंचित सामग्रियोंद्वारा ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा सम्मानित शूद्रोंने उसका अभिषेक किया और अभिषेक हो जानेपर श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए महामना कर्णकी उन सब लोगोंने स्तुति की ।। ४४—४७ ।।

ततोऽभिषिक्ते राजेन्द्र निष्कैर्गोभिर्धनेन च ।
वाचयामास विप्राग्र्यान् राधेयः परवीरहा ॥ ४८ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार अभिषेक-कार्य सम्पन्न हो जानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले राधापुत्र कर्णने स्वर्णमुद्राएँ, गौएँ तथा धन देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया ।।
(स व्यरोचत राधेयः सूतमागधवन्दिभिः ।
स्तूयमानो यथा भानुरुदये ब्रह्मवादिभिः ।।

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