भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1657

स नागप्रवरोऽत्युग्रो विधिवत् कल्पितो बभौ । उदयाद्र्यग्रयभवनं यथाभ्युदितभास्करम् ॥ २२ ॥ उस अत्यन्त भयंकर गजराजको विधिपूर्वक सजाया गया था, वह सूर्योदयसे युक्त उदयाचलके उच्चतम शिखरके समान सुशोभित होता था ॥ २२ ॥

तस्यायसं वर्म वरं वररत्नविभूषितम् । ताराव्याप्तस्य नभसः शारदस्य समत्विषम् ॥ २३ ॥ उसका लोहेका बना हुआ उत्तम कवच श्रेष्ठ रत्नोंसे विभूषित होकर ताराओंसे भरे हुए शरत्कालीन आकाशके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ २३ ॥

स तोमरव्यग्रकरश्चारुमौलिः स्वलंकृतः । शरन्मध्यंदिनार्काभस्तेजसा व्यदहद् रिपून् ॥ २४ ॥ उस समय सुन्दर मुकुट और आभूषणोंसे विभूषित हो हाथमें तोमर लेकर शरत्कालके मध्याह्न सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले भीमसेन अपने तेजसे शत्रुओंको दग्ध करने लगे ॥ २४ ॥

तं दृष्ट्वा द्विरदं दूरात् क्षेमधूर्तिर्द्विपस्थितः । आह्वयन्नभिदुद्राव प्रमनाः प्रमनस्तरम् ॥ २५ ॥ उनके उस हाथीको दूरसे ही देखकर हाथीपर ही बैठे हुए महामना क्षेमधूर्तिने महामनस्वी भीमसेनको ललकारते हुए उनपर धावा किया ॥ २५ ॥

तयोः समभवद् युद्धं द्विपयोरुग्ररूपयोः । यदृच्छया द्रुमवतोर्महापर्वतयोरिव ॥ २६ ॥ जैसे वृक्षोंसे भरे हुए दो महान् पर्वत दैवेच्छासे परस्पर टकरा रहे हों, उसी प्रकार उन भयानक रूपधारी दोनों गजराजोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ २६ ॥

संसक्तनागौ तौ वीरौ तोमरैरितरेतरम् । बलवत् सूर्यरश्म्याभैर्भित्त्वान्योन्यं विनेदतुः ॥ २७ ॥ जिनके हाथी एक-दूसरेसे उलझे हुए थे, वे दोनों वीर क्षेमधूर्ति और भीमसेन सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले तोमरोंद्वारा एक-दूसरेको बलपूर्वक विदीर्ण करते हुए जोर-जोरसे गर्जने लगे ॥ २७ ॥

व्यपसृत्य तु नागाभ्यां मण्डलानि विचेरतुः । प्रगृह्य चोभौ धनुषी जघ्नतुर्वै परस्परम् ॥ २८ ॥ फिर हाथियोंद्वारा ही पीछे हटकर वे दोनों मण्डलाकार विचरने और धनुष लेकर एक-दूसरेपर बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ २८ ॥

क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्बाणशब्दैस्तु सर्वतः । तौ जनं हर्षयन्तौ च सिंहनादं प्रचक्रतुः ॥ २९ ॥